हिसार। राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक अब स्वाइन फीवर और स्वाइन पॉक्स की एक ही वैक्सीन तैयार करेंगे। दोनों बीमारियां सुअरों में फैलती हैं। केंद्र को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की ओर से यह प्रोजेक्ट मिला है। वैज्ञानिकों के अनुसार एक ही वैक्सीन तैयार होने से सुअरों को दोनों बीमारियों के लिए अलग-अलग टीके नहीं लगाने पड़ेंगे।
राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. रियेश और डॉ. शनमुगा सुंदरम इस प्रोजेक्ट पर काम करेंगे। डॉ. रियेश के अनुसार भारत में अभी तक स्वाइन पॉक्स की कोई वैक्सीन नहीं बनी है जबकि चीन में इसकी वैक्सीन उपलब्ध है। इस बीमारी में सुअरों के शरीर पर छोटे-छोटे दाने हो जाते हैं। हालांकि इसकी मृत्यु दर काफी कम है लेकिन एक माह से कम उम्र के सुअर के बच्चों को इसका अधिक खतरा रहता है और उनकी मौत भी हो सकती है। बीमारी के कारण सुअरों का वजन भी कम हो जाता है। आखिरी बार दो-तीन साल पहले इसके मामले सामने आए थे।
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स्वाइन फीवर है जानलेवा बीमारी
स्वाइन फीवर एक जानलेवा बीमारी है। इसकी वैक्सीन पहले से मौजूद है। इस बीमारी में मृत्यु दर 60 से 80 प्रतिशत तक होती है, जिससे पशुपालकों को काफी नुकसान होता है। संक्रमित सुअरों को बुखार आता है और कान के पीछे नील पड़ जाता है।
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ऐसे तैयार की जाएगी वैक्सीन
डॉ. रियेश के मुताबिक, प्रोजेक्ट के तहत पहले स्वाइन पॉक्स की वैक्सीन तैयार की जाएगी। इसके बाद रिकॉम्बीनेंट इंजीनियरिंग तकनीक की मदद से स्वाइन फीवर का जीन स्वाइन पॉक्स की वैक्सीन में डाल दिया जाएगा। इससे तैयार वैक्सीन दोनों बीमारियों के खिलाफ कारगर होगी। स्वाइन फीवर का वायरस बार-बार अपना रूप बदलता है। ऐसे में इस बीमारी के नए वेरिएंट के लिए वैक्सीन तैयार करने में कम से कम दो से तीन साल लग सकते हैं। स्वाइन पॉक्स और स्वाइन फीवर की एक ही वैक्सीन होने पर नए वेरिएंट के लिए कम समय में वैक्सीन तैयार की जा सकेगी।
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देश में 90.55 लाख सुअर
20वीं पशु गणना के अनुसार देश में 90.55 लाख सुअर हैं। सबसे ज्यादा 20.99 लाख सुअर असम में हैं जबकि हरियाणा में इनकी आबादी 1.08 लाख है। देशभर में करीब 25 लाख लोग सुअर पालन करते हैं।
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आईसीएआर की तरफ से संस्थान को यह प्रोजेक्ट मिला है। इस वैक्सीन के बनने से सुअर पालकों को काफी फायदा होगा।
- टीके भट्टाचार्य, निदेशक, राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र।