हिसार। वोट के लिए रेवड़ी बांटने वाले बयान पर हो रही चर्चा में हिसार के नौजवान भी शामिल हुए। अमर उजाला के कार्यालय में आयोजित संवाद कार्यक्रम में युवाओं ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखी। युवाओं का कहना है कि सरकार को नि:शुल्क शिक्षा और चिकित्सा की व्यवस्था करनी चाहिए। इसके साथ ही रोजगार के भी व्यापक प्रबंध करने जरूरी ह्रै।
युवाओं ने कहा कि जो अत्यंत ही जरूरतमंद हैं, उनके लिए मुफ्त अथवा सब्सिडी पर सामान देना चाहिए। आर्थिक स्थिति के आधार पर बिजली, पानी व अन्य जरूरी सेवाओं को नि:शुल्क करने की प्राथमिकता होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री की बात सही है, मुफ्त की रेवड़ी बांटनी बंद करनी चाहिए। मगर इसके लिए अच्छी व सस्ती शिक्षा, चिकित्सा व रोजगार का भी प्रबंध किया जाए। लोग जब आत्मनिर्भर होंगे तो स्वयं ही मुफ्त का सामान लेना बंद कर देंगे। इसके अलावा अक्षम लोगों के जीवन यापन के लिए जरूरी सामान भी बांटना चाहिए। - अजय, छात्र
सरकार लोगों का ध्यान जरूरी मुद्दों से भटका रही है। महंगी शिक्षा के चलते मध्यम वर्ग पर बोझ बढ़ रहा है। सरकारी नौकरियां नहीं मिल रही हैं। उद्योग भी बंद होते जा रहे हैं। बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है। पार्ट टाइम जॉब देकर युवाओं का भविष्य बर्बाद किया जा रहा है। जब युवा सपने ही नहीं देखेंगे तो क्या तरक्की करेंगे। - सचिन यादव, छात्र
मुफ्त का सामान बंटने पर जरूरतमंद के अलावा साधन संपन्न लोग भी इसका लाभ लेते हैं। यह सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग तो है ही, लोगों में आलस्य भी बढ़ता है। इससे आने वाले कुछ ही वर्षों में देश की आर्थिक स्थिति और बदहाल होगी। इसलिए सभी सरकारों को मुफ्त के सामान बांटने पर रोक लगानी चाहिए। - शुभम पूनिया छात्र
शिक्षा, सड़क, चिकित्सा आदि मूलभूत सुविधाएं तो पूरी तरह से नि:शुल्क होनी ही चाहिए। अच्छी शिक्षा व चिकित्सा से ही लोगों के जीवन स्तर में सुधार आएगा। इसके अलावा अगर सरकार अपने नागरिकों को कुछ सामान बांटना चाहती है तो बांटे, लेकिन इसके लिए धन का इंतजाम कैसे होगा, इसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। - सतीश गिल, छात्र
सरकार की आर्थिक नीतियों के चलते देश में असमानता बढ़ी है। 10 प्रतिशत अमीरों की संपत्ति में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जबकि गरीबों की हालत और खराब होती जा रही है। युवा नौकरी के लिए भटक रहे हैं और जो नौकरी कर रहे हैं, वे भविष्य को लेकर चिंतित हैं। कई राज्य की सरकारें आर्थिक संकट के कुचक्र में फंसती जा रही हैं। - अकबर बागेरिया, छात्र
सरकार जो भी सामान मुफ्त बांटती है, उसके बदले कहीं न कहीं टैक्स वसूला जाता है अथवा कर्ज लेना पड़ता है। इससे राज्यों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है। मुफ्त में बांटने की जगह अगर सब्सिडी दे दी जाए तो इससे न केवल अर्थव्यवस्था का संकट दूर होगा, बल्कि लोग उस सामान की कीमत को भी समझेंगे। - विशाल खटक, छात्र
रेवड़ी बांटने वाला बयान केवल मौलिक मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है। श्रीलंका संकट को देखते हुए देश में लोग शिक्षा, रोजगार आदि मुद्दों पर बात करने लगे थे। सभी सरकारों को शिक्षा, चिकित्सा व रोजगार पर फोकस करना होगा। श्रीलंका संकट से सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए। - अजय भारतीय, छात्र
शिक्षा और रोजगार का बेहतर प्रबंध हो जाए तो सरकारों को कुछ मुफ्त बांटना ही नहीं पड़ेगा। जिन लोगों को किसी तरह से अच्छी शिक्षा और रोजगार मिल जाता है, उन्हें आवास, राशन या किसी अन्य प्रकार का भत्ता सरकारों को नहीं देना पड़ता है। इसलिए पूरा फोकस शिक्षा व रोजगार पर होना चाहिए। - नमनदीप छात्र
मुफ्त में सामान बांटने का काम देश व प्रदेश की हर सरकार कर रही है। इस राष्ट्रीय समस्या पर राजनीति स ऊपर उठकर विचार करना होगा। लॉकडाउन के दौरान मुफ्तखोरी की आदत और बढ़ी है। इस पर नियंत्रण जरूरी है। इसके अलावा सबके लिए रोजगार का प्रबंध किया जाना भी जरूरी है, तभी जाकर देश को सही दिशा मिलेगी। - प्रतीक राठी, छात्र
अभी देश की हालत ऐसी नहीं है कि सभी के पास सब कुछ मौजूद हो। प्रदेश सरकार ने स्कूलों में टैब बंटवाया है, इसका फायदा सभी बच्चों को मिलेगा। बहुत से बच्चे ऐसे हैं, जिनके माता-पिता टैब नहीं खरीद सकते थे। इसलिए सरकार को जरूरत के अनुसार मुफ्त सामान बांटना भी चाहिए। - देव रावल, छात्र
सरकार जनकल्याण के नाम पर जितना खर्च करती है, उसके बजाय अगर शिक्षा पर खर्च होता तो आने वाला भविष्य बेहतर होता। मध्यम व निम्न आय वर्ग के लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए परेशान होते हैं, कुछ तो प्रबंध कर भी नहीं पाते। इसलिए सरकार को सभी के लिए मुफ्त शिक्षा का प्रबंध जरूर करना चाहिए। - दीपक, छात्र
श्रीलंका संकट हमारे देश के लिए सबक है। सरकारें मुफ्त बांटने का निर्णय लें, लेकिन इस पर होने वाले खर्च का भी ध्यान रखें। ऐसा न हो कि वोट के लिए मुफ्त बांटने के चक्कर में देश आर्थिक संकट से घिर जाए। इसलिए जितनी चादर हो, उतना पैर पसारने की नीति पर कायम रखते हुए ही निर्णय लिए जाए। - हितेन, छात्र