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Hisar News: डिजिटल टेक्नोलॉजी से भैंस पालन में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का होगा समाधान

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हिसार। जलवायु परिवर्तन के कारण पशुपालन, विशेषकर भैंस पालन के क्षेत्र में आ रही चुनौतियों से निपटने के लिए अब डिजिटल टेक्नोलॉजी का सहारा लिया जाएगा। इस दिशा में रणनीति तैयार करने के लिए राष्ट्रीय भैंस अनुसंधान केंद्र (एनआरसीबी) में 26 अक्तूबर को एक दिवसीय राष्ट्रीय वर्कशॉप आयोजित की जा रही है।
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इस वर्कशॉप में देशभर के 40 वैज्ञानिकों के साथ प्रगतिशील पशुपालक भी हिस्सा लेंगे। इस दौरान जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए आधुनिक तकनीकों, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, बायोसेंसर और सेंसर-आधारित निगरानी प्रणालियों पर विस्तृत चर्चा होगी।

वरिष्ठ वैज्ञानिक और विशेषज्ञ होंगे शामिल
वर्कशॉप में आईसीएआर के निदेशक डॉ. एमएल जाट, डीडीजी एक्सटेंशन डॉ. राजबीर सिंह, डीडीजी एनीमल साइंस डॉ. राघवेंद्र, बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय पटना के कुलपति डॉ. इंद्रजीत सिंह और सीएसआईआर लैब चंडीगढ़ के अधिकारी शामिल होंगे। चूंकि यह आयोजन डिजिटल टेक्नोलॉजी पर केंद्रित है, इसलिए इसमें आईआईटी रोपड़ के वैज्ञानिक और रोबोटिक कंपनी डेलावल के प्रतिनिधि भी भाग लेंगे।
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पशुपालक बताएंगे अपनी चुनौतियां
वर्कशॉप में प्रदेश के पशुपालक भी शामिल होंगे, जो जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न समस्याओं और उनके समाधान पर अपने अनुभव साझा करेंगे। वैज्ञानिकों की ओर से बताया जाएगा कि डिजिटल टेक्नोलॉजी का प्रयोग पशुओं के स्वास्थ्य, दुग्ध उत्पादन, प्रजनन और व्यवहार निगरानी में किस तरह किया जा सकता है, ताकि पशुपालन को और अधिक टिकाऊ बनाया जा सके।

भैंस अनुसंधान केंद्र में चल रहा अभिनव प्रोजेक्ट
केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान में इस दिशा में पहले से ही एक साढ़े 14 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट चल रहा है। इस प्रोजेक्ट में आईआईटी रुड़की और ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ एडिलेड सहयोग कर रही हैं। इसके तहत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित बायोसेंसर और गतिविधि निगरानी सेंसर विकसित किए जा रहे हैं, जिनसे भैंसों के स्वास्थ्य, उत्पादन और व्यवहार से जुड़ा डेटा एकत्र कर उसका विश्लेषण किया जाएगा। इन तकनीकों के माध्यम से पशुपालक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए वैज्ञानिक निर्णय लेने में सक्षम होंगे।
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26 अक्तूबर को संस्थान में राष्ट्रीय वर्कशाप आयोजित की जा रही है। इसमें आईसीएआर के निदेशक सहित अन्य वैज्ञानिक व पशुपालक भी शामिल होंगे।
- डॉ. यशपाल, निदेशक, केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान।
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