हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (आईसीएआर) नई दिल्ली के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर ने आरोप लगाया है कि मक्का फसल योजना की नाकामयाबी के बाद हरियाणा सरकार अब सूरजमुखी की फसल को प्रोत्साहन करने की तैयारी कर रही है जिसका कोई औचित्य नहीं है। डॉ. लाठर के मुताबिक बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों से महंगे भाव सूरजमुखी के बीज खरीद कर किसानों को मुफ्त बांटे जाएंगे, जिसमें किसानों का भला होने की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती।
उन्होंने बताया कि सूरजमुखी भूजल बचाने वाली फसल नहीं हैं। प्रदेश में फसल की बिजाई फरवरी-मार्च के महीने में की जाती है और जून-जुलाई में फसल पकती है और फसल को लगभग 5-6 सिंचाई की जरूरत होती है जो सरासर भूजल की बर्बादी है। मार्च से जून तक प्रदेश में भयंकर गर्मी पड़ती है और वर्षा नगण्य होती है। इस तरह की अव्यवहारिक योजनाओं से तो लगता है कि कृषि विभाग के बड़े अधिकारियों को चंडीगढ़ के वातानुकूलित कार्यालयों में बैठ कर कृषि और प्रदेश की जलवायु की कोई जानकारी नहीं है।
नका कहना है कि उत्तर पश्चिम भारत में धान-गेहूं फसल चक्र से पिछले पांच दशकों में भूजल-भूमि के सेहत और पर्यावरण को बहुत नुकसान हुआ है जिसे उचित फसल चक्र (सीधी बिजाई धान-चना-मूंग फसल चक्र) अपना कर ठीक किया जा सकता है। इससे बिना सरकारी सब्सिडी के किसानों को आर्थिक फायदा होगा।