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Hisar News: खेतों से रूठी कपास की रंगत, सात साल में 65 फीसदी घटा रकबा

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अग्रोहा में कपास की फसल
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हिसार। हरियाणा में किसानों की पसंदीदा नकदी फसल मानी जाने वाली कपास गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। लगातार आर्थिक नुकसान, गुलाबी सुंडी का बढ़ता प्रकोप और बारिश से होने वाली तबाही के कारण किसानों का कपास की खेती से भरोसा उठता जा रहा है। हालत यह है कि वर्ष 2019-20 में प्रदेश में कपास का रकबा 8.01 लाख एकड़ था जो 2025-26 में घटकर केवल 2.84 लाख एकड़ रह गया है जो पिछले सात वर्षों की तुलना में 65 फीसदी कम है। पिछले तीन वर्षों में ही कपास बिजाई का क्षेत्रफल लगभग 50 फीसदी रह गया है।
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कपास की खेती में लगातार आ रही गिरावट ने कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विभाग की चिंता बढ़ा दी है। किसान अब कपास की जगह धान, बाजरा और अन्य फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। प्रदेश में कपास की बिजाई का सीजन पूरा हो चुका है और इस बार भी रकबा पिछले आठ वर्षों के सबसे निचले स्तर पर दर्ज किया गया है। कपास का दायरा बढ़ाने के लिए कृषि विभाग ने इस वर्ष कई प्रयास किए। विभाग ने प्रमोशन फॉर कॉटन कल्टीवेशन इन हरियाणा विंग का गठन कर सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, भिवानी, चरखी दादरी, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ जैसे प्रमुख कपास उत्पादक जिलों में जागरूकता अभियान चलाए। किसानों को सूक्ष्म पोषक तत्वों के लिए दो हजार रुपये प्रति एकड़ तथा देसी कपास की खेती पर चार हजार रुपये प्रति एकड़ की सहायता भी दी जा रही है। इसके बावजूद किसान कपास की ओर लौटने को तैयार नहीं हैं।
लागत ज्यादा, आमदनी कम
हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. विनय महला की रिपोर्ट भी किसानों की चिंता को सही ठहराती है। रिपोर्ट के अनुसार कपास की खेती पर प्रति एकड़ औसत लागत 40,024 रुपये आती है जबकि बिक्री से किसानों को केवल 24,081 रुपये और उप उत्पादों से 801 रुपये की आमदनी होती है। इस तरह किसानों को प्रति एकड़ औसतन 15,142 रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। रिपोर्ट में कपास की खेती में खेत की तैयारी, बीज, उर्वरक, सिंचाई, दवा और तुड़ाई समेत सभी खर्च शामिल किए गए हैं। डॉ. विनय का कहना है कि वर्ष 2017 के बाद से कपास उत्पादकों को लगातार नुकसान झेलना पड़ रहा है। कीटों और रोगों के बढ़ते प्रकोप के कारण खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है। जल्द नई और अधिक प्रतिरोधी किस्में विकसित नहीं हुईं तो अगले तीन से पांच वर्षों में हरियाणा में कपास उत्पादक किसानों की संख्या में और बड़ी गिरावट आ सकती है।
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हिसार और फतेहाबाद के किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान

फतेहाबाद में कपास की खेती की लागत सबसे अधिक 48,721 रुपये प्रति एकड़ दर्ज की गई जबकि यहां किसानों को औसतन 17,315 रुपये प्रति एकड़ का नुकसान हुआ। सबसे ज्यादा 17,515 रुपये प्रति एकड़ का औसत नुकसान हिसार जिले के किसानों ने झेला। महेंद्रगढ़ में 14,144 रुपये, चरखी दादरी में 15,276 रुपये, भिवानी में 14,852 रुपये, सिरसा में 11,250 रुपये और रेवाड़ी में 9,548 रुपये प्रति एकड़ का औसत नुकसान दर्ज किया गया।

पिछले सात वर्षों में कपास का रकबा (हेक्टेयर में)
वर्ष रकबा
2019-20 8.01 लाख
2020-21 7.39 लाख
2021-22 6.35 लाख
2022-23 5.74 लाख
2023-24 5.77 लाख
2024-25 3.98 लाख
2025-26 2.84 लाख
(स्रोत: कृषि विभाग)
पिछले तीन-चार वर्षों से कपास की खेती में किसानों को लगातार नुकसान हो रहा है। खासकर अगस्त-सितंबर में होने वाली बारिश फसल को सबसे अधिक प्रभावित करती है। वर्ष 2025 में बाढ़ जैसे हालात के कारण कई जिलों में कपास की फसल बर्बाद हो गई थी। इसके अलावा गुलाबी सुंडी का प्रकोप भी बड़ी समस्या है। यही कारण है कि कपास का रकबा लगातार घट रहा है।
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- डॉ. आत्मा राम गोदारा, संयुक्त निदेशक (कपास), कृषि विभाग, हरियाणा।
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