सिवानी मंडी। जब सिवानी की गलियों में जय श्रीराम की गूंज होती है, जब रावण की गर्जना और परशुराम का क्रोध दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देते हैं, तब यह शहर दर्शक नहीं, रामकथा का जीवंत पात्र बन जाता है। मगर विडंबना यह है कि 43 वर्षों से चली आ रही रामलीला की परंपरा आज स्थायी मंच के अभाव में टूटने के कगार पर है।
समाजसेवी भागीरथ जांगड़ा ने रामलीला को सामाजिक समरसता की प्रतीक बताते हुए स्थायी मंच की मांग की। उन्होंने कहा कि रामलीला केवल मंचन नहीं, यह समाज को जोड़ने वाली कड़ी है। इसमें जाति, धर्म, वर्ग की कोई दीवार नहीं। अगर समय रहते इसे संरचना नहीं मिली तो हमारी परंपरा विखंडित हो जाएगी।
1981 से श्रीराम नाटक क्लब द्वारा आयोजित रामलीला के लिए पुराना थाना परिसर को स्थायी मंच के रूप में प्रस्तावित किया गया है। यह स्थान वर्तमान में उपेक्षा का शिकार है, लेकिन इसे विकसित कर सांस्कृतिक केंद्र में बदला जा सकता है। प्रवीण बालकिया, जो 2014 से रावण की भूमिका निभा रहे हैं, कहते हैं कि रावण बनना अभिनय नहीं, साधना है। उन्होंने गंभीर चोट के बावजूद मंच नहीं छोड़ा। उनके पुत्र भी इस परंपरा से जुड़े हैं।
मुकेश बंसल (मुक्की) जिनकी जुबां पर रामलीला के संवाद रटे हैं, मंच के पीछे भी कलाकारों का मार्गदर्शन करते हैं। दिल्ली के कपड़ा व्यापारी नरेश बंसल वर्षों से क्लब का सहयोग कर परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। 2009 से जुड़े मास्टर कृष्ण वर्मा की उद्घोषणा रामलीला की आत्मा बन चुकी है। उनकी आवाज श्रद्धा की लहर बनकर दर्शकों तक पहुंचती है।
कांग्रेस विधायक लोहारू राजबीर सिंह फरटिया ने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण की लीला हमारे समाज की आध्यात्मिक चेतना है। रामलीला केवल मनोरंजन नहीं, यह समाज की जड़ों से जुड़ी आस्था है। मुख्यमंत्री से मुलाकात कर सिवानी में स्थायी मंच की मांग करूंगा। वहीं,भाजपा मंडल अध्यक्ष सुरेंद्र जांगड़ा ने भी मंच निर्माण का आश्वासन दिया।
सिवानी की सांस्कृतिक पहचान
राम नाटक क्लब के प्रवक्ता सोनू खेड़ा ने कहा कि यह केवल आयोजन नहीं, सिवानी की पहचान है। अब वक्त है कि प्रशासन इस पुकार को सुने और इस परंपरा को स्थायित्व दे।