हिसार। बाल श्रम रोकने के कानूनी उपायों से कुछ हद तक इस पर रोक लगी थी, लेकिन कोविड संकट ने फिर से मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हिसार में भी बड़ी संख्या में बच्चे सुबह स्कूल जाने की बजाय रोटी के लिए काम की तलाश में निकल रहे हैं। अब इस स्थिति को संभालने के लिए सामाजिक संगठनों को अतिरिक्त प्रयास करना होगा।
संविधान के मुताबिक किसी उद्योग, कल-कारखाने या किसी कंपनी में मानसिक या शारीरिक श्रम करने वाले 5-14 वर्ष उम्र के बच्चों को बाल श्रमिक कहा जाता है। कारखानों, कार्यशालाओं, प्रतिष्ठानों, खानों के अलावा घर में काम करने वाले बच्चे भी बाल श्रमिक माने जाते हैं। इसके अलावा गली मोहल्ले में कूड़ा बीनने वाले और फेरी लगाने वाले बच्चे भी बाल श्रमिक हैं। सबसे ज्यादे बाल श्रमिक घरों में खाना पकाने, साफ-सफाई और ऐसी अन्य घरेलू गतिविधियों में लगे हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर 73 करोड़ बच्चे खतरनाक काम में लगे हुए हैं। कोविड काल के बाद यह संख्या और बढ़ी है। भारत में 43 लाख से अधिक बच्चे बाल मजदूरी करते हैं। कोविड संकट ने इस समस्या को और गंभीर कर दिया है। बीमारी और रोजगार खत्म होने के चलते गरीब परिवारों के तमाम बच्चे फिर से पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने लगे हैं। होटल, मोटर गैराज के अलावा घरों में भी बच्चों से काम लिया जा रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. महेंद्र सिंह और बाल कल्याण अधिकारी विनोद कुमार बताते हैं कि इस समस्या के समाधान के लिए समाज के हर जिम्मेदार नागरिक को आगे आना होगा, तभी आने वाले भविष्य को सुरक्षित किया जा सकेगा। हरियाणा सरकार इस मुद्दे के स्थायी समाधान के लिए प्रयास कर रही है।
बाल श्रम रोकने के लिए ये है संवैधानिक प्रावधान
अनुच्छेद 15 (3) - बच्चों के लिए अलग से कानून बनाने का अधिकार देता है
अनुच्छेद 21 - (6 -14) वर्ष के बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार
अनुच्छेद 23 - बच्चों की खरीद और बिक्री पर रोक लगाता है
अनुच्छेद 24 - 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को ख़तरनाक कामों में प्रतिबन्ध
अनुच्छेद 39 - नीति निर्देशक सिद्धांत के अंतर्गत बच्चों के स्वास्थ्य और उनके शारीरिक विकास के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने का आदेश देता है।
अनुछेद 45 - नीति निर्देशक सिद्धांत के अंतर्गत आने वाला इस अनुच्छेद में भी 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की देखभाल और शिक्षा की जिम्मेदारी राज्यों की है।
अनुच्छेद 51 भन - माता पिता पर बच्चों की शिक्षा के लिए अवसर प्रदान करने का एक मौलिक कर्तव्य निर्धारित करता है
बाल अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए कानून
कारखाना अधिनियम 1948 - 14 साल तक की आयु वाले बच्चों को कारखाने में काम करने से रोकता है।
खदान अधिनियम 1952 - 18 साल से कम आयु वाले बच्चों को खदानों में काम करने पर प्रतिबन्ध लगाता है
अनैतिक तस्करी (बचाव) अधिनियम 1956
बाल श्रम अधिनियम 1986 - 14 साल से कम उम्र के बच्चों को जीवन जोखिम में डालने व्यवसायों में काम करने पर रोक लगाता है।
राष्ट्रीय बाल श्रम नीति 1987
- किशोर न्याय देखभाल और संरक्षण अधिनियम 2000 - बच्चों के रोजगार को दंडनीय बनाता है।
- बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006
- राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग 2007 - बाल अधिकारों के उल्लंघन के जुड़े मसले को सुलझाने का काम
- नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012
- किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2015
गेस्ट एडिटर--सुनिधि (दर्शन अकादमी)
‘बाल श्रम एक गंभीर अपराध है। जिस देश में बच्चों को खेलने व पढ़ने का अवसर नहीं मिलेगा, वहां के युवा पथ भ्रमित होकर अपराध की राह पकड़ेंगे ही। यह देश व समाज की प्रगति में बाधक है। इसलिए बच्चों को पढ़ाई, खेल व भोजन का अधिकार मिलना चाहिए। परंतु दुर्भाय है कि अपने देश में ही तमाम बच्चे अपने अधिकार से वंचित हैं। बच्चों को कूड़ा बीनते, दुकानों पर काम करते देखना अत्यंत दु:खद है। यह काम अपराध सरकारी प्रयास से नहीं रुक सकता। समाज के प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक को इस दिशा में प्रयास करना होगा। प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों बच्चों से बात करके हौसला बढ़ाया था। अन्य जिम्मेदारों को भी ऐसा करना चाहिए। बचपन खुशहाल होगा, तभी देश सशक्त बनेगा।’