अस्सी करोड़ रुपये के रेक्सिल (कीटनाशक) घोटाले की जांच के लिए सीबीआई की टीम ने वीरवार को चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में करीब पांच घंटे तक रिकॉर्ड खंगाला। इस दौरान सीबीआई टीम ने एचएयू के कई वैज्ञानिकों से पूछताछ की।
एचएयू के प्लांट ब्रीडिंग व प्लांट पैथोलॉजी विभाग दोनों में रह चुके रिटायर्ड वैज्ञानिक डॉ. एमएस बैनीवाल को भी सीबीआई जांच के दौरान बुलाया गया। डॉ. बैनीवाल ने सीबीआई के समक्ष कहा कि वह पिछले डेढ़ साल से इस घोटाले को उजागर करने में लगे हुए हैं।
उन्होंने रेक्सिल खरीद मामले में सीबीआई की टीम को कुछ दस्तावेज भी मुहैया करवाए। पांच घंटे तक सीबीआई अधिकारियों ने कुलपति डॉ. केएस खोखर व अन्य वैज्ञानिकों से पूछताछ की। जो इस सर्टिफिकेशन से जुड़े हुए थे। सीबीआई टीम में डीएसपी आरएस गुंजाल व अन्य सदस्य शामिल थे।
अशोक खेमका ने उठाए थे सवाल
हरियाणा सीड्स डेवलपमेंट कारपोरेशन गेहूं के बीज की खरीद करती है। रेक्सिल का गेहूं की बीजों को लेकर सर्टिफिकेशन देने के मामले में एचएसडीसी के तत्कालीन एमडी रहे आईएएस अशोक खेमका ने जांच की थी। उन्हें इस पूरे मामले में घोटाला नजर आया। तत्कालीन सरकार को पत्र लिख जानकारी दी।
पत्र में उन्होंने अक्टूबर 2010 में रेक्सिल की खरीद बिना सीड सर्टिफिकेशन एजेंसी की रिकमंडेशन के करने पर सवाल खड़े किए थे। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि रेक्सिल मामले में राजस्व को चूना लगाया गया है। इसके बाद इस मामले में विजिलेंस विभाग ने शिकायत दर्ज की।
मौजूदा सरकार ने इस मामले में सीबीआई जांच की मांग की थी। जांच शुरू होने के साथ ही सीबीआई ने रेक्सिल से जुडे़ दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए थे। कृषि विभाग, एचएसडीसी के अलावा सीड सर्टिफिकेशन एजेंसी सभी से पूछताछ कर उनका रिकॉर्ड जब्त कर लिया गया।
कंपनी को पहुंचाया फायदा : याचिकाकर्ता
एचएयू के प्लांट ब्रिडिंग विभाग के पूर्व सीनियर साइंटिस्ट व याचिकाकर्ता डॉ. एमएस बैनीवाल ने बताया कि रेक्सिल दवा मेरे पास आई थी। गेहूं में पाई जानी वाली लूज स्मट या खुली कंगियारी के लिए इस दवा का प्रयोग किया जाना था। यह बीज के साथ आने वाली बीमारी थी।
अन्य किसी गेहूं की बीमारी में इसका प्रयोग नहीं होना था। रेक्सिल का प्रयोग लूज स्मट के लिए किया जाना था, जबकि इसका प्रयोग कर्नाल बर्ड में किया जाने लगा। कृषि मंत्री शरद पवार ने साल 2010 में लूज स्मट या खुली कंगियारी बीमारी 100 प्रतिशत खत्म होने को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को पत्र लिखा था। इसके बावजूद 2010 के बाद रेक्सिल की खरीद जारी रही।
हरियाणा सीड्स डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड ने साल 2010 से 14 तक लगातार इस दवा को खरीदा है। सर्टिफाइड गेहूं के बीजों में इसी कोई जरूरत नहीं थी। इस दवा की खरीद कर सरकार व एचएयू प्रशासन ने सीधा कंपनी को लाभ पहुंचाया है।
80 करोड़ रुपये का था घोटाला
रेक्सिल दवा घोटाले में प्रदेश सरकार को करीब 80 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होने का अंदाजा लगाया गया है। इसमें करीब चार साल तक बिना उपयोग वाली इस दवा की खरीद की जाती रही।
कुलपति ने बात करने से किया इंकार
एचएयू कुलपति डॉ. केएस खोखर ने अपने चपरासी के जरिए मैसेज दिया कि वह इस मामले में कुछ जानकारी नहीं रखते है। इस संबंध में सीबीआई के अधिकारियों से ही बातचीत की जाए। याद रहे डॉ. केएस खोखर के कार्यकाल में ही विवि प्रशासन ने रेक्सिल को लेकर सहमति जताई थी।