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नैनो पार्टिकल की मदद से खरपतवार के बीजों को किया जा सकेगा निष्क्रिय

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खरपतवार नाशकों का ज्यादा इस्तेमाल होने से इनका असर अब कम होने लगा है। उदाहरण के तौर पर गेहूं की फसल में पैदा होने वाली खरपतवार फलारिस माइनर (मंदुसी) पर आइसोप्रोटून नाम की दवा ने असर करना बंद कर दिया है। इस समस्या को देखते हुए इसका कोई विकल्प तैयार करना होगा और नैनो पार्टिकल इसका एक विकल्प हो सकता है। यह बात तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय के एग्रोनॉमी विभाग के अध्यक्ष डॉ. सीआर चिन्नामुथु ने कही। वह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू) में वीरवार से शुरू हुई दो दिवसीय एग्रोनॉमिस्ट मीट में भाग लेने आए हुए हैं।
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उन्होंने बताया कि वह नैनो पार्टिकल को लेकर पिछले दस वर्षों से शोध कर रहे हैं। नैनो पार्टिकल में जिंक, सिल्वर व टाइटेनियम का इस्तेमाल किया है। डॉ. चिन्नामुथु ने बताया कि नैनो पार्टिकल की दद से खरपतवार के बीजों को पूरी तरह से निष्क्रिय किया जा सकता है। अभी इस पर रिसर्च रही है कि यह पशुओं या इंसान के लिए किसी तरह से हानिकारक तो नहीं है। उन्होंने बताया कि खरपतवारनाशकों को सूक्ष्म जीवाणु छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देते हैं, जिससे यह पानी के साथ मिलकर जमीन में चल जाते हैं और इनका असर लंबे समय तक नहीं रहता। अगर किसी फसल की कटाई होने तक इनका असर रखना है तो इनका कैप्सूल की तरफ इस्तेमाल करना होगा। इससे इनका असर लंबे समय तक रखा जा सकता है।
एक हेक्टेयर की पराली न जलाने से फर्टिलाइजर के 12 कट्टों की होगी बचत
एक हेक्टेयर में बोई गई धान की फसल से आठ टन पराली निकलती है और आठ टन पराली जलाने से 12 टन विषैली गैसें पैदा होती हैं। अगर किसान यह पराली जलाने की बजाय खेेत में ही मिला दे तो उसे फर्टिलाइजर के 12 कट्टों की बचत होती। इन 12 कट्टों की कीमत करीब 3300 रुपये पड़ती है। यह कहना है कि अटारी इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर डॉ. राजबीर सिंह का, जो एचएयू में आयोजित एग्रोनॉमिस्ट मीट में भाग लेने पहुंचे थे। उन्होंने बताया कि अगर किसान जीरो टिल विधि से गेहूं की बिजाई करते हैं तो खाद कम लगेगी, खरपतवार कम होगा और सिंचाई भी कम लगेगी। पारंपरिक विधि की बजाय जीरो टिल विधि से की बिजाई करने का फायदा यह है कि उक्त फसल पर बेमौसमी बारिश का असर कम होता है। साथ ही अचानक तापमान बढ़ने से भी फसल का बुरा प्रभाव नहीं पड़ता, जबकि पारंपरिक तरीके से बिजाई करने इस विधि में खाद पानी लगाने से पहले दी जाती हैँ, जिससे खाद पौधों की जड़ों तक पहुंचती है।
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