हिसार के आर्यनगर में बना डंपिंग स्टेशन।
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हिसार। जैव-चिकित्सा अपशिष्ट (बायोमेडिकल वेस्ट) की दुर्गंध से आर्यनगर निवासियों का जीना मुहाल हो गया है। ग्रामीणों ने शहर के अस्पतालों से निकलने वाले अपशिष्ट के निस्तारण में मानकों की अनदेखी का आरोप लगाया है। रविवार को ग्रामीणों ने एक भूखंड स्वामी को मौके पर बुलाकर वहां डाला जा रहा मेडिकल कचरा हटाने की मांग की। अगले एक माह तक समस्या का समाधान न करने पर कूड़े के वाहनों को रोकने की चेतावनी दी।
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत पर्यावरण और वन मंत्रालय (एमओईएफ) की ओर से जैव-चिकित्सा अपशिष्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम बनाए गए हैं। इसके तहत बायो-मेडिकल वेस्ट को उत्पादन स्थल पर ही रंग-कोडित डिब्बों में अलग करना, उचित सुरक्षा उपकरणों के साथ परिवहन करना, भस्मीकरण, ऑटोक्लेविंग या रासायनिक कीटाणुशोधन जैसी विधियों से उपचारित करना जरूरी है।
क्लोरीनयुक्त प्लास्टिक व रक्त की थैलियों जैसे कुछ अनुपयोगी सामानों का पुनर्चक्रण और निपटान भी नियमों के तहत करना होता है। इसके तहत अनुबंधित एजेंसी ने चार, पांच साल से आर्यनगर में जयपुर-चंडीगढ़ फोरलेन किनारे डंपिंग स्टेशन बना रखा है। यहां शहर के करीब 100 निजी अस्पतालों से काली पन्नी में आने वाला सामान्य मेडिकल कचरा निस्तारित किया जाता है। ग्रामीणों का आरोप है कि इसमें सभी प्रकार का जैव-चिकित्सा अपशिष्ट डाला जा रहा है। इससे पूरे माहौल में दुर्गंध फैली रहती है।
हर गांव के लोग कर रहे विरोध: जैव-चिकित्सा अपशिष्ट डंपिंग स्टेशन के लिए पहले गंगवा की रामगढ़ बस्ती समेत पातन और लुदास गांव में जगह तलाशी गई लेकिन सभी गांवों के लोगों ने विरोध किया। इस कारण फर्म संचालकों को इसका स्थान बदलना पड़ रहा है।