प्रगतिशील किसानों को सम्मानित करते हुए मुख्य अतिथि डॉ. डी.के. यादव व वीसी प्रो. कांवोज। स्रोत :
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हिसार। मधुमक्खियां कृषि उपज में बढ़ोतरी की आधारशिला हैं और इनका संरक्षण न केवल फसल उत्पादकता बल्कि जैव विविधता को भी सुदृढ़ करता है। यह बात भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) फसल विज्ञान के उप महानिदेशक डॉ. डीके यादव ने मंगलवार को कही। वे चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू) में अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (एआईसीआरपी) मधुमक्खी एवं परागणकर्ता की तीन दिवसीय वार्षिक समूह बैठक को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। बैठक में देशभर के 26 केंद्रों से 40 वैज्ञानिक और प्रतिभागी शामिल होने आए हैं।
आईसीएआर, नई दिल्ली और एचएयू के कीट विज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में डॉ. यादव ने कहा कि मधुमक्खियां और परागणकर्ता कृषि प्रणाली की प्राकृतिक नींव हैं, जो फसलों की गुणवत्ता और पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि करती हैं। उन्होंने वैज्ञानिकों से अपील की कि वे टिकाऊ कृषि प्रणाली में मधुमक्खियों की भूमिका को और व्यापक रूप से सामने लाएं। उन्होंने मधुमक्खी एवं परागण से संबंधित दो पुस्तकों का विमोचन भी किया। आईसीएआर की एडीजी डॉ. पूनम जसरोटिया ने कहा कि मधुमक्खियां पारिस्थितिकीय स्थिरता और कृषि उत्पादकता की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। एआईसीआरपी परियोजना ने मधुमक्खी पालन को वैज्ञानिक दिशा देने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाया है। बैठक के दौरान परियोजना समन्वयक डॉ. सचिन एस. सुरेश ने वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जबकि अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग ने एचएयू में चल रहे अनुसंधानों की जानकारी दी। मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले सुभाष चंद, अनिल सिंह सिंधु, संदीप जाटान, रमेश पुरी, धर्मपाल, सुरेंद्र, रामपाल, दिनेश कुमार, प्रभात फोगाट और विशाल पचार को सम्मानित किया गया।
मधुमक्खी पालन किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम : वीसी
बैठक की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. बीआर कांबोज ने कहा कि मधुमक्खी पालन किसानों की आय बढ़ाने के साथ पर्यावरण संरक्षण का भी एक सशक्त साधन है। उन्होंने बताया कि एचएयू ने इस क्षेत्र में कई शोध उपलब्धियां हासिल की हैं और नई तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने का कार्य निरंतर जारी है।