हांसी। हांसी का बड़सी दरवाजा, हांसी का ही गौरव नहीं है बल्कि हरियाणा की शान है व राष्ट्रीय स्तर के ऐतिहासिक स्मारकों में से एक है। इतिहासकारों के अनुसार अनुमान है कि अपने समय का अपनी तरह का यह देश भर में एक ही दरवाजा है जो अभी भी सही सलामत अवस्था में है। यह दरवाजा पुराने शहर की चहारदीवारी के दक्षिण में है। अब आवासीय बस्तियों के विस्तार होने के कारण यह दरवाजा शहर के मध्य में दिखता है।
गर्व कीजिए हांसी में हैं में आज बात ऐतिहासिक बड़सी गेट की होगी। गेट के संबंध में बताया जाता है कि दिल्ली पर चौहानों का आधिपत्य हो जाने के बाद सन् 1164 ई० में पृथ्वीराज द्वितीय (पृथ्वी भट्ट) अजमेर की गद्दी पर बैठे। उन्होंने हांसी में अपने मामा गुहिलोत किल्हण को किलेदार नियुक्त किया। किल्हण पृथ्वी भट्ट का विश्वसनीय होने के साथ-साथ वीर योद्धा भी थे।
किल्हण ने हांसी दुर्ग में एक मजबूत राजपूत सेना का गठन किया। इसी समय लाहौर में एक तुर्क सुलतान खुसरो शाह मलिक ताजुद्दौला गद्दी पर बैठा था। वह यहां से राजपूताना की सीमा में घुसपैठ करता रहता था। सन् 1166 ई० में जब पृथ्वीराज भट्ट भी हांसी के दुर्ग में आया हुआ था, उस समय लाहौर का यह तुर्क सुलतान हांसी दुर्ग पर हमला करने आ पहुंचा।
यहां राजपूत सेना ने तुर्क सेना के दांत खट्टे कर दिए व खुसरो शाह मलिक ताजुद्दौला अपनी जान बचाकर भाग गया। इस द्वार को पहले भट्ट दरवाजा कहा जाता था। अंग्रेजों के समय से इसे बड़सी गेट कहा जाने लगा।
गेट पर लगे हुए हैं निशान
दरवाजे के अग्र भाग पर अपने सम्राट की वीरता के प्रतीक स्वरूप दोनों तरफ बब्बर शेर से लड़ाई करते हुए सम्राट को दिखाया गया है। इसके अग्र भाग पर दोनों और हिंदू स्थापत्य कला के प्रतीक पूर्ण विकसित कमल पुष्प बनाए गए हैं।
पांच द्वार के अंदर बसी हुई थी हांसी-गुर्जर
पांच गेट के अंदर बसे हुए शहर को हांसी कहा जाता था। हांसी में उमरा गेट, बड़सी गेट, दिल्ली गेट, चार कुतुब गेट व गौसाईं गेट थे। चार द्वार तो नष्ट हो गए। पांचवा द्वार बड़सी गेट आज भी मौजूद है। पहले इन सभी गेटों पर बड़े-बड़े लकड़ी के दरवाजे लगे हुए थे। जो रात को बंद किए जाते थे। पहले आबादी इन्हीं द्वार के अंदर थी। बाद में आबादी बाहर आकर बसने लगी।- फतेह सिंह गुर्जर, इतिहास के जानकार।