गोवंश के लिए अभी तक लाइलाज लंपी बीमारी के लिए जो टीका बना है, उसके प्रयोग से पशुओं में कुछ दिनों बाद ही रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने लगती है। तीन सप्ताह बाद पशु पूरी तरह से सुरक्षित होता है। शोध में यह भी पाया गया है कि अभी प्रयोग की जा रही वैक्सीन हिट्रोलागस में करीब 10 दिन बाद एंटीबॉडी बननी शुरू होती है, जबकि लंपी प्रोवैक आईएनडी के प्रयोग के बाद पशुओं में सात दिन बाद ही एंटीबॉडी बनने लगती है। हिट्रोलागस (गोटपॉक्स की वैक्सीन) को 70 प्रतिशत प्रभावी बताया गया है।
वर्ष 2019 में भारत में आई लंपी बीमारी के लिए वैक्सीन की खोज करने वाले राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार के वैज्ञानिक डॉ. नवीन कुमार ने यह महत्वपूर्ण जानकारी साझा करते हुए बताया कि एलएसडी के वायरस से तैयार की गई स्वदेशी टीका लंपी प्रोवैक आईएनडी पूरी तरह से सुरक्षित है।
इसका टीका लगाए जाने के सात दिन बाद गोवंश में एंटीबॉडी बननी शुरू होती है जो तीन सप्ताह में पूरी तरह से सक्रिय होती है। उसके बाद रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है। अगर टीका लगने के एक सप्ताह के अंदर पशु किसी अन्य संक्रमित पशु के संपर्क में आता है, तो उसके संक्रमित होने की पूरी आशंका है। इसलिए संक्रमण को रोकने के लिए पशुओं का भ्रमण रोकना सबसे जरूरी है।
हर हाल में रोकें पशुओं का भ्रमण
डॉ. नवीन ने बताया कि लंपी एक संक्रामक बीमारी है। अगर कोई पशु चारागाह में जाता है और उसमें वायरस है तो वहां से अन्य पशुओं में भी बीमारी फैल सकती है। अभी यह बीमारी लाइलाज है, इसलिए भी पशुपालकों को ज्यादा सचेत रहना चाहिए। टीकाकरण के बाद पशु को तीन सप्ताह तक दूसरे पशु से बचाकर रखना जरूरी है। यह तभी संभव है जब पशुओं का भ्रमण रोका जाए।
स्वदेशी वैक्सीन के व्यावसायिक उत्पादन की अनुमति जल्द मिलने की उम्मीद
गोवंश के लिए विशेष रूप से बनी वैक्सीन लंपी प्रोवेक आईएनडी को अभी व्यावसायिक उत्पादन की अनुमति नहीं मिली है। हालांकि इसके फार्मूले को मंजूरी मिल चुकी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की तरफ से कृषि मंत्रालय भारत सरकार को इससे संबंधित पत्रावली भेजी गई है। राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र के निदेशक डा. यशपाल ने बताया कि इस वैक्सीन के उत्पादन की मंजूरी जल्द मिलने की उम्मीद है। वैक्सीन एक साल तक पशु की सुरक्षा करने में सक्षम है। उसके बाद फिर से टीकाकरण करना होगा। पूरे देश मे टीका लगाने के लिए 33 करोड़ वैक्सीन की जरूरत होगी।
अश्व अनुसंधान केंद्र लगा रहा खुद का बनाया हुआ टीका
अश्व अनुसंधान केंद्र ने टीका के तीसरे चरण के परीक्षण के लिए डेढ़ लाख टीके बनाए हैं, जिनका उपयोग किया जा रहा है। राजस्थान और हरियाणा की गोशालाओं में इसका टीका लगाया जा रहा है।
- डॉ. नवीन कुमार, राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र, हिसार