अग्रोहा। इतिहास के पन्नों में जिनके बलिदान की गाथा दर्ज है उनके अपने ही गांव की गौरव पट्ट पर नाम नदारद हैं। आजादी की लड़ाई में पराक्रम दिखाने वाले चार स्वतंत्रता सेनानी दशकों बाद भी सम्मान की उस पहचान से वंचित हैं जिसके वे हकदार हैं। शोध में यह विसंगति सामने आने के बाद बलिदानियों संघर्ष और योगदान को गांव की गौरव पट्टिका पर स्थान देने की मांग उठने लगी है।
स्वतंत्रता सेनानी राम सिंह के पुत्र भगवान फौगाट और अमर शहीद नेतराम के प्रपौत्र (पड़पोते) ने यह शोध किया है। उनका कहना है कि सरकारी दस्तावेज में नाम दर्ज होने के बावजूद गौरव पट्ट से नाम गायब रहना चिंताजनक है।
हकदार लोगों को पेंशन समेत अन्य लाभ दिलाने के लिए उन्होंने स्थानीय जिला प्रशासन और ग्राम पंचायतों से बिना किसी कागजी या प्रशासनिक देरी के नाम दर्ज करने की मांग की है ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके संघर्ष और बलिदान से प्रेरणा ले सकें।
इस अभियान से जुड़े लोगों ने वर्ष 2019 से 2025 तक छह साल में 400 से अधिक लोगों का रिकॉर्ड जुटाया है। इस दौरान प्रदेश के मुख्य सचिव रहे प्रशासनिक अधिकारियों ने भी सभी तत्कालीन डीसी को पत्र भेजकर इस अभियान में सहयोग का निर्देश दिया लेकिन सरकार की ओर से वांछित सहयोग नहीं मिल सका।
आधिकारिक दस्तावेज हू इज हू ऑफ पंजाब फ्रीडम फाइटर्स के अनुसार गांव मीरपुर, हिसार निवासी दयाल सिंह का जन्म वर्ष 1920 में हुआ था। वह भारतीय सेना की 5/7 बटालियन राष्ट्रीय राइफल्स में सिपाही थे।
बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज (आईएनए) में शामिल हुए और एएफवी बटालियन में सिपाही के रूप में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। गांव फरीदपुर, फतेहाबाद निवासी छोटू का जन्म 1923 में हुआ था। उन्होंने देश को आजाद कराने के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। तहसील टोहाना, जिला फतेहाबाद के गांव कुलां (कुलाना) निवासी राम सिंह ने आईएनए के तहत पश्चिमी मोर्चे पर अंग्रेजों से युद्ध किया। अग्रोहा क्षेत्र के गांव कालीरावण निवासी रसला सिंह भी आईएनए के सिपाही थे। युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बना लिया था। उन्होंने कुआलालंपुर जेल में छह महीने की कठिन कैद भी झेली।