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बेटियों को अखाड़े में उतारने पर नाराज थे रिश्तेदार : महावीर

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सिरसा। राष्ट्रमंडल खेल-2010 की स्वर्ण पदक विजेता गीता और कांस्य पदक विजेता बबीता के पिता महावीर सिंह को अपनी बेटियों पर नाज है लेकिन वे इस बात को भी नहीं भूले हैं कि जब उन्होंने बेटियों को अखाडे़ में उतारा था तो गांव के लोग उनसे नफरत करने लगे थे और रिश्तेदार नाराज हो गए थे। लोग ताने देते नहीं थकते थे कि कैसे पहलवान बेटियों की शादी करेगा लेकिन उनकी बेटियों ने विश्व में गांव, प्रदेश और देश का नाम रोशन किया। आज लोग उन्हें गीता और बबली के पिता के रूप में जानते हैं। अब उनके गांव में बेटियाें का पूरा मान सम्मान दिया जाता है। ग्रामीण अब बेटियों को भी बेटों की तरह पालने लगे हैं। महावीर शुक्रवार को जेसीडी विद्यापीठ में पत्रकरों से बातचीत कर रहे थे।
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उन्हाेंने कहा कि उनकी बेटी गीता, बबीता, रितु, संगीता, भतीजी विनेश और प्रियंका राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रही हैं। गीता, बबीता और रितु एशिया कप में स्वर्ण पदक हासिल कर चुकी हैं। उन्हाेंने बताया कि उनके घर में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेटियों द्वारा जीते गए बीस स्वर्ण पदकों सहित करीब 45 पदक हैं। उन्हें कहा कि अफसोस इस बात का है कि सरकार ने इसमें उनकी कोई मदद नहीं की यहां तक मैट तक नहीं उपलब्ध करवाया। उन्होंने बताया कि जब करणम मल्लेश्ववरी ने ओलंपिक में वैट लिफटिंग में कांस्य पदक हासिल किया और सरकार की ओर से उन्हें 25 लाख रुपये पुरस्कार स्वरूप प्रदान किए गए तभी उन्होंने सोच लिया था कि बेटियों को पहलवानी सिखाएंगे और एक करोड़ का पुरस्कार हासिल करके रहेंगे। वे खुद पहलवान रहे ऐसे में उन्हें बेटियों का पहलवानी के दांव पेंच सिखाने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। तीन साल की मेहनत रंग लाई और वर्ष 2003 में गीता ने एशिया कप में पहला स्वर्ण पदक हासिल किया। इसके बाद गीता और बबीता ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्हें इस बात की खुशी है कि उनके गांव में बेटियों के प्रति सोच बदली है और आज बेटियां खेलों में बढ़चढ़ कर भाग ले रही है। उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात का जरूर मलाल है कि द्रोणाचार्य अवार्ड के लिए उनका चयन तक नहीं किया गया जबकि उनकी बेटियों ने देश की झोली में पदक ही पदक डाले हैं।
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