अमर उजाला ब्यूरो
हिसार। होलिका दहन के लिए बुधवार रात 8:58 बजे के बाद का मुहूर्त शुभ रहेगा। इसके विपरीत भद्रा के पुच्छ और मुख काल में होलिका दहन करना शुभ नहीं रहता। यह कहना है ज्योतिर्विद पं. देव शर्मा का। उन्होंने कहा कि शास्त्रानुसार भद्रा रहित प्रदोष काल व्यापिनी फाल्गुन पूर्णिमा में होलिका दहन किया जाता है। भद्रा में होलिका दहन नहीं किया जाता। भद्रा निशीथ काल के बाद समाप्त हो रही भद्रामुख वाला समय छोड़कर भद्रा में ही होलिका दहन कर लेना चाहिए।
उन्होंने बताया कि 5:13 से 6:25 बजे तक भद्रा का पुच्छ काल है और 6:25 से 8:58 तक भद्रा का मुख काल रहेगा। इन दोनों समय के दौरान होलिका दहन करना शुभ नहीं रहता। हालांकि अगर बहुत जरूरी हो तो पुच्छ काल में दहन कर सकते हैं, लेकिन भद्रा समाप्ति के बाद दहन करना सबसे अधिक शुभ रहता है।
गली-मोहल्लों में तैयार की गई है होलिका
होलिका गली-मोहल्लों और कई सेक्टरों के कम्यूनिटी सेंटरों में तैयार की गई है। कई स्थानों पर धार्मिक-सामाजिक संगठनों द्वारा होलिका दहन किया जाएगा, जबकि कई मोहल्लों में युवाओं की टोलियों द्वारा होलिका तैयार की गई हैं।
पहले और आज की होलिका में आया काफी अंतर (फोटो-26)
आज की होलिका और पुरानी होलिका में दिन-रात का अंतर आ गया है। आदमपुर निवासी छबीलदास कालीराणा ने कहा कि पहले युवाओं द्वारा होलिका तैयार की जाती थी। अलग-अलग मोहल्ले की अलग-अलग होलिका बनाई जाती थी। युवाओं में कंपीटिशन होता था कि उनके मोहल्ले की होलिका सबसे ऊंची हो। युवाओं की टोलियां होलिका के लिए झाड़ इकट्ठा करने एक महीना पहले जुट जाते थे। होलिका की साज-सज्जा की जाती थी, लड़ियों से सजाई जाती थी और डेक लगाकर दिनभर होली के गीत बजते थे। एक अलग ही माहौल होता था। दिनभर महिलाएं और बच्चे होलिका पूजन के लिए आते थे और गोबर की डाल आदि चढ़ाकर होलिका का पूजन करते थे। अब छोटी होलिका बनाई जाती हैं और लोग केवल पूजन के लिए छोटी सी होलिका का ही दहन कर लेते हैं।