हरियाणा में एमएल खट्टर के नेतृत्व में भाजपा सरकार है। उनके लिए सत्ता कांटों भरा ताज रहा है। जाट आरक्षण पर हुई सियासत और हिंसा को भला कौन भुला सकता है। फरवरी 2016 में जाट आंदोलन के नाम पर हुई हिंसा को लेकर भाजपा की जमकर किरकिरी हुई थी। सियासी मजबूरियों के चलते उसके लिए फैसला लेना मुश्किल हो गया था। हिंसा का तांडव ऐसा था कि भाजपा मंत्रियों, विधायकों के घरों को भी निशाना बनाया गया। इस पर राज्य और केंद्र सरकार दोनों चुप्पी साधे रहे। बड़े पैमाने पर सैकड़ों लोगों के खिलाफ केस भी दर्ज हुआ था। लेकिन सियासी मजबूरियों के चलते खट्टर सरकार ने इनपर से केस वापस ले लिया था।
न सिर्फ जाट बल्कि बाकी तबकों में भी भाजपा सरकार के खिलाफ जबरदस्त नाराजगी थी। लेकिन उस घटना के 22 महीने बाद नगर निगम में भाजपा के पक्ष में जनादेश ने पार्टी को खासी राहत पहुंचाई है। तीन राज्यों में हार के चलते भाजपा पहले से ही कांग्रेस और विपक्ष के निशाने पर है। अगर हरियाणा में भी हार का सिलसिला जारी रहता तो भाजपा के लिए हालात और प्रतिकूल हो जाते। लेकिन लगता है कि हरियाणा की जनता ने भाजपा की लाज रख ली है। कम से कम वह एक और हार व अपमान से बच गई है।