जिले में मलेरिया और डेंगू के बढ़ते प्रकोप के बीच कई जगह पर लोग अभी भी सहयोग के लिए तैयार नहीं हैं। लोगों को अपनी सेहत से ज्यादा घरों की दीवारों के रंग खराब होने की चिंता सता रही है। ऐसे में उन तमाम उपायों पर अमल नहीं हो पा रहा है, जिससे डेंगू के आतंक से पूरी तरह निजात मिल सके।
जिले में अभी तक डेंगू के 180 मामले सामने आ चुके हैं। अगस्त में डेंगू के करीब 40 मामले मिले थे, वहीं सितंबर माह के अंत तक यह आंकड़ा 171 पर पहुंच गया।
मलेरिया विभाग ने डेंगू के बढ़ते प्रकोप के कारण सितंबर माह से फोगिंग शुरू की थी। लार्वा को पनपने से रोकने के लिए टैमीफोस और फोगिंग के लिए मेलाथियोन दवा इस्तेमाल की जा रही है।
जिला मलेरिया विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि शहरी क्षेत्र में लोग घरों के भीतर दवा का छिड़काव ही नहीं करने देते। लोगों को चिंता होती है कि कहीं दवा से घरों की दीवारें गंदी न हो जाएं। दरअसल, मच्छरों की रोकथाम के लिए पहले डेल्टामेथरीन दवा इस्तेमाल की जाती थी। इस दवा से दीवारों पर धब्बे पड़ जाते थे।
हालांकि मेलाथियोन से दीवारों पर धब्बे नहीं पड़ते, इसके बावजूद लोग घरों के भीतर स्प्रे कराने से सीधे इंकार कर देते हैं। कई बार तो लोग फोगिंग के समय घरों की खिड़कियां और दरवाजे तक नहीं खोलते। यही कारण है कि मच्छर रोधी तमाम अभियानों के बाद भी डेंगू के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।
तो एक महीने तक नहीं दिखेगा मच्छर
डेल्टा मेथरीन दवा इतनी कारगर है कि अगर एक बार इसका स्प्रे करा लिया जाए तो एक माह तक मच्छर दोबारा दीवार पर बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा। लोगों को इस बारे में जागरूक करने के लिए बैठकों का आयोजन किया जा रहा है। सिविल सर्जन डा. पुष्पा बिश्नोई का कहना है कि मच्छर रोधी अभियानों में जुटी टीमों के काम की रोजाना समीक्षा होती है। प्रयास यही है कि जल्द से जल्द मलेरिया और डेंगू पर नियंत्रण पा लिया जाए।