शहर की अग्रवाल कॉलोनी में रजाई में धागा डालतीं महिलाएं।
फतेहाबाद। सर्दी के मौसम की शुरुआत हो चुकी है, बाजारों में गर्म कपड़ों की खरीद करने वाले लोगों की भीड़ बढ़ने लगी है। इस बार ऊनी कंबलों की रजाई के मुकाबले कपास की रुई से बनी रजाइयों की मांग में तेजी है। लोग प्राकृतिक गर्माहट और हल्केपन के कारण इन्हें अधिक पसंद कर रहे हैं। हालांकि, पिछले साल फाइबर और रेडीमेड कंबलों के सामने रूई की रजाइयों का काम मंदा रहा था।
सर्दी शुरू होते ही लोग अपनी पुरानी रजाइयों को निकलवाकर उनकी दोबारा भराई और तगाई करवाने में जुट गए हैं। इस वजह से रजाई भरने और उसमें हाथ से धागा डालकर तगाई करने वाले कारीगरों की आजीविका फिर से चल पड़ी है। इससे बाजार में कारीगरों को अच्छे मुनाफे की उम्मीद है। एक रजाई की तगाई के लिए वे लगभग 150 से 200 रुपये तक लेते हैं। रजाई की पिनाई और भराई का काम करने वाले कारीगर कालूराम, प्रभू और रविंद्र आदि ने बताया कि इस सीजन में कपास के भाव में आई कमी के चलते रुई के भाव में थोड़ी कमी आई है, जिससे रजाई बनवाने का कुल खर्च पिछले वर्षों की तुलना में थोड़ा कम हुआ है।
वर्तमान में रुई का औसत मूल्य लगभग 65 से 80 प्रति किलोग्राम है। सिंगल बेड की रजाई में लगभग 3-4 किलो और डबल बेड की रजाई में 6 किलो तक रुई लगती है। पहले कंबलों ने काम कम कर दिया था, लेकिन अब लोग पुरानी रुई वाली रजाई को ही नया करवाना पसंद कर रहे हैं। इसमें गर्माहट ज्यादा और वजन कम होता है। हालांकि, अभी भी फाइबर और सिंथेटिक रजाइयों की उपलब्धता और कम कीमत के कारण कपास की रजाइयों का काम सीमित हुआ है। लेकिन जो लोग वर्षों से चली आ रही परंपरा और बेहतर गर्माहट को प्राथमिकता देते हैं, वे अब भी रूई की रजाई ही चुन रहे हैं।