: कारगिल के युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिक मनोहर लाल के चित्र के साथ उनका परिवार ।
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कारगिल विजय के साथ हमारे जिले के वीर योद्धाओं की यादें जुड़ी हुई हैं। ऐसी यादें जो जिंदगी भर प्रत्येक जिलेवासी के दिल में बसी रहेंगी। कारगिल विजय का जिक्र आते ही जेहन में गूंजता है एक ऐसा नाम जिसने गोलियां तो खाई एक सैनिक के तौर पर, लेकिन शहादत के बाद उसने सेना में अफसर बनने के सपने को साकार किया। हम बात कर रहे हैं जिले के गांव ढाणी डुल्ट के अमर शहीद जवान मनोहर लाल की। घोड़ी चढ़ने की उम्र में मनोहर तिरंगे में लिपटकर वतन की राह में सर्वोच्च बलिदान दे गए। 18 जून 1999 को कारगिल के द्रास सेक्टर में दुश्मनों की गोलियों का जवाब देते हुए जिले का ये नौजवान सिपाही शहीद हो गया था।
जीते जी रहे भारतीय सेना के सिपाही, शहादत के बाद पहुंचा था प्रमोशन का लेटर
किस्मत भी देखिए, क्या खेल दिखाती है, शहीद मनोहर लाल जितना समय जीवित रहे, इस सपने के साथ जिये कि फौज में अफसर बनना है। इसके लिए सिपाही के तौर पर फौज में भर्ती होकर लेफ्टिनेंट की परीक्षा भी दी जिसमें वो पास भी हुए लेकिन बतौर लैफ्टिनेंट का ज्वाइनिंग लैटर उनकी शहादत के बाद घर पहुंचा।
दुश्मन की गोली लगने के बाद भी जा भिड़ा घुसपैठियों से
साल 1999 में कारगिल के द्रास सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों के साथ जंग के मैदान में शहीद मनोहर लाल ने गजब की बहादुरी दिखाई। उसके पार्थिव शरीर के साथ आए उसके साथियों ने बताया था कि 18 जून 1999 को मनोहर लाल ने अद्वितीय शौर्य का परिचय देते हुए कई पाकिस्तानी घुसपैठियों को ठिकाने लगाया। इस बीच उसे दुश्मन की एक गोली आकर लगी लेकिन इसके बावजूद वो डिगा नहीं। गोली लगने के बावजूद वो सीधा जाकर दुश्मनों से जा भिड़ा और तब तक उनसे लड़ता रहा जब तक उसकी आखिरी सांस भी खर्च नहीं हो गई। शहीद मनोहर लाल के अंतिम शब्द थे ‘भारत माता की जय’। इस जयघोष के साथ ही जिले का ये वीर सिपाही वीरगति को प्राप्त हो गया। शहादत के पांच दिन बाद शहीद मनोहर लाल का अंतिम संस्कार उसके पैतृक गांव ढाणी डुल्ट में ही हुआ था।
सुविधाएं अवश्य मिली, सरकारी वादे आजतक अधूरे
कारगिल में देश के लिए जान गंवाने वाले शहीद मनोहर लाल की शहादत के बाद सरकार ने उनके परिवार का पूरा ख्याल रखा। सरकार की ओर से शहीद के नाम पर गैंस एजेंसी अलॉट करने के साथ साथ उनके भाई को भी सरकारी नौकरी दी गई ताकि वो अपने परिवार का पूरा ख्याल रख सकें लेकिन तत्कालीन सरकार द्वारा किए गए कुछ वादे अभी तक अधूरे हैं। मसलन सरकार द्वारा तब ऐलान किया गया था कि शहीद के नाम पर कालेज का नामकरण होगा। इसके अलावा उनके पिता रामेश्वर ने दरख्वास्त की थी कि उनके शहीद बेटे की एक प्रतिमा शहर में भी लगाई जाए लेकिन दोनों ही जगह सिर्फ आश्वासन ही मिले। रामेश्वर दास बताते हैं कि गांव में ही पुस्तकालय तो शहीद मनोहर लाल के नाम बना दिया गया, लेकिन अभी तक उसमें अच्छी और ज्ञान वर्धक किताबें नहीं मिलती।