गांवों में सफेद मक्खी को लेकर खेतों का निरीक्षण करते कृषि वैज्ञानिक।
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फसलों पर सफेद मक्खी के प्रकोप को लेकर कृषि विज्ञान केंद्र फतेहाबाद और कृषि विभाग की संयुक्त टीम सर्वे के लिए मार्च माह में गठित की गई थी। इस टीम में डॉ. मुकेश मेहला, कृषि पौध संरक्षण अधिकारी, कृषि विभाग फतेहाबाद और डॉ. राकेश कुमार चुघ, कृषि विज्ञान केंद्र फतेहाबाद व सब्जेक्ट स्पेशलिस्ट को इस टीम का हिस्सा बनाया गया। डॉ. राकेश ने बताया कि मार्च महीने में सर्वे करना शुरू किया गया और यह हर सप्ताह किया गया। इस सर्वे में सामने आया कि मार्च माह में सब्जियों, खरपतवारों और फलों पर सफेद मक्खी कहीं नहीं थी।
अप्रैल माह में भी यह कहीं नहीं पाई गई। मई-जून के महीने में सफेद मक्खी देसी कपास पर जांडली में देखी गई, पर उस समय उसकी संख्या बहुत कम 3-4 प्रति 10 पौधा पाई गई। सफेद मक्खी खरपतवारों (पीली बूटी) पर 2 प्रति 10 पौधा, भिंडी में दो प्रति 10 पौधा, मूंग में एक प्रति 10 पौधा पाई गई। सब्जियों में टमाटर में 1-2, बैंगन में 4-5, भिण्डी में 4-5 प्रति पौधा पाई गई।
डा. राकेश ने बताया कि सर्वे में सफेद मक्खी के पौढ़ और निम्फ कम पाए गए। सर्वे में एनकारषिया कीट देखा गया जोकि प्राकृतिक तौर पर सफेद मक्खी के बच्चे और प्यूपों को खाता है। सर्वे में यह भी पता चला कि किसान इस बारे बहुत ही जागरूक है क्योंकि उन्होंने जून के अंत में कोई स्प्रै नहीं किया। स्प्रे न करने से जो मित्र कीट कपास पर पाए जाते हैं, मक्खी को खाते रहते हैं। स्प्रे न करने से बचे हुए थे। टीम ने किसानों को सलाह दी कि वे खरपतवारों को नष्ट कर दें, संतुलित मात्रा में खादों का प्रयोग करें।
खेतों में 50 ट्रैप प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें। पत्तियों पर चिपचिपाहट व औसतन 6-8 पौढ प्रति पत्ती मिलने पर शुरू में केवल नीम आधारित जैसे नीमीसीडीन, नीम मार्क अचूक, नीम गार्ड के दो छिड़काव पांच दिन के अंतराल पर करें। डॉ. मुकेश मेहला ने बताया कि कीटनाशकों का स्प्रे करते समय यह ध्यान रखें कि स्प्रे पत्तों की निचली सतह पर अवश्य जाए। स्प्रे कृषि वैज्ञानिकों की सलाह पर ही करें। स्प्रे करते समय टैक मिक्सिंग न करें। डॉ. मुकेश ने बताया कि अभी किसान नीम आधारित स्प्रे कर सकते हैं।