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बिना तैयारी ही स्वास्थ्य विभाग ने निजी लैब से खत्म किया अनुबंध

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फतेहाबाद का नागरिक अस्पताल। - फोटो : Fatehabad
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फतेहाबाद। हेपेटाइटिस सी यानी काला पीलिया को लेकर जिला रेड जोन में शामिल है। वर्ष 2017 में सरकार ने जिला मुख्यालय में ही जांच और उपचार की सुविधा दी थी। लेकिन अब एक बार फिर जांच को लेकर स्वास्थ्य विभाग यहां के काला पीलिया मरीजों को झटका दे चुका है और जांच के लिए मरीज भटक रहे हैं। हेपेटाइटिस जांच के लिए निजी लैब के साथ किया गया अनुबंध खत्म होने के बाद जिला मुख्यालय में मरीजों की जांच नहीं हो पा रही है। बिना तैयारी स्वास्थ्य विभाग द्वारा लिए गए फैसले का खामियाजा यहां के मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।
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बता दें कि स्वास्थ्य विभाग ने हेपेटाइटिस सी और बी के सैंपल को लेकर पिछले माह फरमान जारी किया था कि निजी लैब के साथ नया अनुबंध नहीं होगा और सैंपल आरटीपीसीआर लैब में भेजे जाएंगे। लेकिन जिला मुख्यालय की लैब में माइक्रोबायोलॉजिस्ट न होने से पिछले चार माह से बंद है। हालांकि अब माइक्रोबायोलॉजिस्ट ज्वाइन कर चुकी हैं और ट्रेनिंग भी पूरी हो गई है लेकिन लैब शुरू नहीं हुई है। निजी लैब से नया अनुबंध न होने से नोडल अधिकारी मरीजों को जांच के लिए निजी लैब में नहीं भेज पा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग का कोर डायग्नोस्टिक के साथ अनुबंध था। जो कि पिछले माह 28 जुलाई को खत्म हो चुका है। नागरिक अस्पताल से रोजाना पहले 10 से 15 मरीजों को जांच के लिए कोर डायग्नोस्टिक पर भेजा जा रहा था। इसके अलाव न ही अब तक अन्य जिले में सैंपल भेजने की योजना बनाई गई है।
जिले में हेपेटाइटिस सी और बी के मरीज
हेपेटाइटिस सी के वर्ष 2017 से अब तक पंजीकृत हुए मरीज : 6310
जांच में पुष्टि हुई : 4850
उपचार पूरा हुआ : 4500
उपचार चल रहा : 350
हेपेटाइटिस बी के मरीज : 385
सामान्य श्रेणी के मरीजों को हुआ था सबसे ज्यादा फायदा
हेपेटाइटिस सी के सामान्य श्रेणी के मरीजों को जिला मुख्यालय में अपने स्तर पर महंगी दवाई लेकर उपचार लेना पड़ रहा था और अनुसूचित जाति के मरीजों को रोहतक पीजीआई में निशुल्क उपचार मिल रहा था। जिला स्तर पर फरवरी 2017 में हेपेटाइटिस सी उपचार की सुविधा शुरू हुई। वर्ष 2020 में हेपेटाइटिस बी का उपचार भी शुरू हो गया है।
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रतिया क्षेत्र के अधिकतर गांव रेड जोन में शामिल
हेपेटाइटिस सी वायरस के लक्षण पांच से लेकर सात सालों के बाद नजर आते हैं। क्षेत्र में सर्वे के दौरान सामने आया था कि आरएमपी डाक्टरों ने इलाके में कई लोगों को एक ही सीरिंज से टीके लगाए जिससे हेपेटाइटिस सी वायरस (एससीवी) एक से दूसरे में चला गया। रतिया व उसके आसपास के क्षेत्र में करीब 11 साल पहले काला-पीलिया के आशंकित मरीज सामने आने लगे थे। रतिया में सर्वे के दौरान करीब 15 सौ मरीज सामने आए और बढ़ते चले गए। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक रतिया, हमजापुर, बुर्ज, बीराबदी, टोहाना, कुलां, अकांवाली, झलनियां, एमपी सोतर, टिब्बी, अयाल्की, नहेड़ी, समैन, चिम्मो, इंदाछुई, बिलासपुर, हिजरावां खुर्द, अहरवां, घासवां, नागपुर, बहबलपुर, नथवान, रत्ताखेड़ा, भिरड़ाना, धीड़, हसंगा, जमालपुर, जल्लोपुर, कमाना समेत जिले के कई गांवों में हेपेटाइटिस सी के मरीज पाए गए।
छह माह बाद दोबारा किया जाता है टेस्ट
हेपेटाइटिस सी की पुष्टि होने पर मरीजों को तीन माह दवा खानी होती है। जिन मरीजों का लीवर खराब हो जाता है, उन मरीजों का 6 महीने दवाई दी जाती है। जिन मरीजों का उपचार पूरा हो गया है, उन्हें हेपेटाइटिस-सी का कार्ड टेस्ट दोबारा करवाने की जरूरत नहीं है, कार्ड टेस्ट 15 साल तक पॉजिटिव रह सकता है। हालांकि वायरस लोड की जांच करने के लिए छह माह बाद डॉक्टर दोबारा टेस्ट करवाते हैं।
कोट
हेपेटाइटिस जांच को लेकर सैंपल निजी लैब द्वारा लिए जाते थे। सैंपल को लेकर को कार्ड जारी कर दिया जाता था और कार्ड के आधार पर संबंधित लैब सैंपल लेकर जांच रिपोर्ट देती थी। विभाग का लैब के साथ अनुबंध खत्म हो चुका है। आरटीपीसीआर लैब में सैंपल भेजे जाने के आदेश आए हैं लेकिन यहां पर लैब बंद है। माइक्रोबायोलॉजिस्ट ने ज्वाइन कर लिया है और ट्रेनिंग भी पूरी हो गई है। जल्द ही लैब शुरू होने की उम्मीद है।
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-डॉ. मनीष टुटेजा, विशेषज्ञ, नागरिक अस्पताल
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