केनोई स्लेलस इवेंट की प्रेक्टिस करते सुरेंद्र ढाका।
फतेहाबाद। बचपन में पोलियो के कारण अपने पैर गंवाने के बाद भी फतेहाबाद के गांव भूथन कलां निवासी सुरेंद्र ढाका (38) ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी दिव्यांगता को पीछे छोड़ते हुए मेहनत की और तैराकी व बोटिंग को अपना कॅरिअर बना लिया। ढाका के हौसले का ही नतीजा है कि वह अब पानी का सीना चीरकर मेडल जीत रहे हैं।
सुरेंद्र ढाका की टांगाें में बचपन से ही पोलियो के कारण कोई हरकत नहीं थी। पिता रामकुमार ढाका ने उनका इलाज भी करवाया, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। सुरेंद्र ढाका ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी। पैरा स्पोर्ट्स को उन्होंने अपना लिया। सुरेंद्र ढाका ने 2012 में तैराकी का प्रशिक्षण शुरू कर दिया और अब तक राष्ट्रीय स्तर पर 20 गोल्ड मेडल हासिल किए चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने कैनो स्लैलम इवेंट में भी भाग लेना आरंभ कर दिया और इस इवेंट में भी वह छाए हुए हैं। उनके नाम कैनो स्लैलम बोट इवेंट में भी अब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चार सिल्वर व एक ब्रांज मेडल जीत चुके हैं। हाल ही में जर्मनी में हुए 30 अगस्त को वर्ल्ड चैंपियनशिप में उनको कैनो स्लैलम इवेंट में कांस्य पदक मिला है। इससे पहले वह एशियन गेम्स में कैनो स्लैलम इवेंट में गोल्ड मेडल हासिल कर चुके हैं। अब वह पैरालंपिक की तैयारी कर रहे हैं। वे इटली में होने वाले कैनो स्लैलम में भाग लेने की तैयारी कर रहे हैं। संवाद
सुरेंद्र ढाका ने हासिल की थी चौथी रैंक
कैनो स्लैलम प्रतियोगिता की वर्ल्ड रैंकिंग में सुरेंद्र ढाका की चौथी रैंक हैं। पैरा एशियन गेम्स में सुरेंद्र ढाका ने कैनो स्लैलम में गोल्ड मेडल हासिल किया तो हाल ही में जर्मनी में हुए इवेंट में चौथी रैंक हासिल की थी। अब उनकी नजर इटली में होने वाली प्रतियोगिता पर है, अगर वह इसमें पहले तीन स्थानों पर आते हैं तो उनका देश की ओर से पैरालंपिक के लिए चयन हो सकता है।
कोट
बचपन से ही मेरे पैर काम नहीं करते थे। बैसाखी के सहारे चलना पड़ा था। पिता की प्रेरणा व स्वीमिंग कोच कमलजीत संधू की प्रेरणा से स्वीमिंग व केनोई स्लेलस कोच मयंक ठाकुर के सानिध्य से आज मैं इस मुकाम पर पहुंचा हूं। अब इटली में होने वाले कैनो स्लैलम प्रतियोगिता की तैयारी कर रहा हूं, ताकि पैरालंपिक के लिए क्वालिफाई कर सकूं।
-सुरेंद्र ढाका, अंतरराष्ट्रीय तैराक व कैनो स्लैलम बोटिंग खिलाड़ी।