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होली पर गुरु और शनि एक साथ रहेंगे अपनी-अपनी राशि में, दूर होंगे अनिष्ट

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फतेहाबाद। इस बार होली चैत्र कृष्ण प्रतिपदा मंगलवार 10 मार्च को मनाई जाएगी। इससे एक दिन पूर्व फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा यानी 9 मार्च को होलिका दहन होगा। होली और होलिका दहन पर इस बार महासंयोग बन रहे हैं। इन संयोगों के बनने से कई अनिष्ट दूर होंगे। जो कि आम व्यक्ति के स्वास्थ्य, व्यापार तथा छात्रों के लिए शिक्षा में फायदेमंद रहेगा। इन संयोगों के बनने के बाद पारिवारिक कलहों का अंत होगा।
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ज्योतिष राजेश शर्मा ने शास्त्रों के हवाले से बताया कि होली और होलिका दहन पर ग्रह गोचरों के खास संयोग बन रहे हैं। कई शताब्दियों के बाद इस बार होली पर गुरु और शनि अपनी-अपनी राशि में एक साथ रहेंगे। गुरु अपनी राशि धनु और शनि अपनी राशि मकर में रहेंगे। वहीं होली पर पारिजात, वेशि और बुधादित्य योग भी बन रहा है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से होलाष्टक शुरू हो जाएगा। यह तिथि 3 मार्च को पड़ रही है यानि होलाष्टक 3 मार्च से शुरू और 9 मार्च को समाप्त होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, होलाष्टक के दौरान कोई भी मांगलिक कार्य शादी, विवाह, वाहन खरीदना या घर खरीदना, अन्य मंगल कार्य नहीं किए जाते हैं। हालांकि इस दौरान पूजा पाठ करने और भगवान का स्मरण और उनके भजन करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।
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होलिका दहन का शुभ मुहूर्त
श्याम मंदिर के पुजारी पंडित राजेश शर्मा के अनुसार इस बार होलिका दहन का पूजन 9 मार्च को होगा। जो निम्न समयानुसार पूजन किया जाए तो शुभ है।
संध्या काल में : 06 बजकर 22 मिनट से 8 बजकर 49 मिनट तक
भद्रा पुंछा : सुबह 09 बजकर 50 मिनट से 10 बजकर 51 मिनट तक
भद्रा मुखा : सुबह 10 बजकर 51 मिनट से 12 बजकर 32 मिनट तक
होलिका दहन कथा
शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन की परंपरा भक्त और भगवान के संबंध का अनोखा एहसास है। कथानक के अनुसार भारत में असुरराज हिरण्य कश्यप राज करता था। उनका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था, लेकिन हिरण्य कश्यप विष्णु द्रोही था। उसने पृथ्वी पर घोषणा कर दी थी कि कोई देवताओं की पूजा नहीं करेगा। केवल उसी की पूजा होगी, लेकिन भक्त प्रहलाद ने पिता की आज्ञा पालन नहीं किया और भगवान की भक्ति लीन में रहा। हिरण्य कश्यप ने पुत्र प्रहलाद की हत्या कराने की कई बार कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो पाया तो उसने योजना बनाई। इस योजना के तहत उसने बहन होलिका की सहायता ली। होलिका को वरदान मिला था, वह अग्नि से जलेगी नहीं। योजना के तहत होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई, लेकिन भगवान ने भक्त प्रहलाद की सहायता की। इस आग में होलिका तो जल गई और भक्त प्रहलाद सही सलामत आग से बाहर आ गए। तब से होलिका दहन की परंपरा है। होलिका में सभी द्वेष भाव और पापों को जलाने का संदेश दिया जाता है।
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