‘मैं जिंदा हूं, कागज के टुकड़े से मानेंगे, मर भी गया तो कागज का टुकड़ा देना पड़ेगा’ ये किसी टूटे दिल वाले शायर की नज्म नहीं, देश की रक्षा के लिए सीमा पर दुश्मनों से लोहा लेने वाले एक पूर्व सैनिक के दिल का दर्द है। ये दर्द जिले के पूर्व सैनिक धर्मवीर काजला ने फेसबुक पर बयां किया है। वजह जानेंगे, तो आप भी चौंक उठेंगे। धर्मवीर काजला 2007 में फौज से रिटायर हुए थे। वह गैलेंटरी अवार्ड विजेता हैं, इसलिए सेना की तरफ से उन्हें प्रतिवर्ष एक लाख रुपये मिलता है। अमूमन होना तो ये चाहिए, कि जब भी ये राशि मिले, काजला को खुश होना चाहिए, लेकिन धर्मवीर के मामले में ऐसा होता नहीं है। जैसे ही ये तारीख नजदीक आती है, धर्मवीर सरपंच से लेकर तहसीलदार के चक्कर काटने शुरू कर देते हैं ताकि अपने जिंदा होने का सबूत जुटा सके। चौंकिए मत, ये सच है।
1991 में ज्वाइन की थी सेना, 2007 में हुए रिटायर, दो बार राष्ट्रपति से सम्मानित
दिसंबर 1991 में सेना में भर्ती होने वाले धर्मवीर काजला साल 2007 में सेवानिवृत्त हुए। तकरीबन 16 साल की नौकरी में 11 साल जम्मू-कश्मीर के संवेदनशील इलाके में पोस्टिंग रही। इसी दौरान दो बार आतंकवादियों से मुठभेड़ में बहादुरी दिखाई और आतंकवादियों को मार गिराया। इस बहादुरी के चलते उन्हें दो बार राष्ट्रपति से गैलेेंटरी अवार्ड सम्मान मिल चुका है। सेना में बतौर सिपाही शामिल हुए धर्मवीर काजला ने दोनों बार राष्ट्रपति अवार्ड अपनी बहादुरी से आतंकवादियों को खदेड़ने के चलते हासिल किया।
प्रमाणपत्र जारी करने वाले सरपंच भी होते हैं हैरान, जताते हैं नाराजगी
फतेहाबाद के गांव बीसला के रहने वाले पूर्व सैनिक धर्मवीर काजला के जिंदा होने का सबूत उनके गांव के सरपंच बलवंत जारी करते हैं। बलवंत की मानें तो पहली बार जब धर्मवीर फौजी उनके पास ‘जिंदा’ होने का प्रमाणपत्र बनवाने आए तो उन्हें हैरानी हुई कि आखिर ऐसे कैसे हो सकता है। हालांकि जब सारी हकीकत पता चली तो तुरंत प्रमाणपत्र बनाकर दे दिया। सरपंच बलवंत कहते हैं कि सोलह साल देश की रक्षा के लिए बार्डर पर तैनात रहने वाला सैनिक अब अपने हक की पेमेंट के लिए जिंदा होने का सबूत देता फिर रहा है।
अधिकारी बोले, सेना का नियम, मानना ही पड़ेगा
पूर्व सैनिक धर्मवीर फौजी द्वारा फेसबुक पर दर्द बयां करने के बारे में जब जिला सैनिक बोर्ड के सचिव रिटायर्ड कर्नल राजपाल अहलूवालिया से बात की गई तो उनका कहना था कि इस बारे में वे कुछ नहीं कर सकते क्योंकि ये सेना का नियम है और सभी को ये नियम मानना पड़ता है। कर्नल अहलूवालिया ने कहा कि जिला सैनिक बोर्ड पूर्व सैनिक के अकाउंट में फंड ट्रांसफर करता है। उन्होंने बताया कि इसे लाइव सर्टिफिकेट कहते हैं और ये सरकार और सेना का बनाया नियम है। इसे हम अपने स्तर पर नहीं बदल सकते।