टोहाना। आर्य समाज स्थित स्वामी दयानंद स्वास्थ्य केंद्र में मिर्गी जागरूकता दिवस पर स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया। इस अवसर पर रोगियों को मिर्गी आने के दौरान बचाव के उपाय बताए गए। वरिष्ठ चिकित्सक डाॅ. शिव सचदेवा ने बताया कि पहले लोग समझते थे कि मिर्गी एक संक्रामक रोग है। मगर मिर्गी न तो संक्रामक रोग है और न ही भूत प्रेत, जादू-टोने वाली बीमारी है।
लोग पहले सोचते थे कि जूता सुंघाकर इसको ठीक किया जा सकता है, यह मिथ्या धारणा है। मिर्गी की बीमारी बच्चे को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। 40-50 साल की आयु के बाद भी ज्यादातर ब्रेन-टयूमर अधिक शराब पीना, स्ट्रोक, दिल के दौरे, सिर में चोट लगना या जैनेटिक प्राबलम, तनाव, कम सोना भी हो सकती है।
उन्होंने बताया कि छोटे बच्चों में ब्रेन का सही विकास न होने की वजह से मिर्गी आ सकती है। अगर बच्चा पैदा होने के बाद वह रोया नहीं तो मिर्गी का संकेत हो सकता है। आजकल सीटी स्कैन, एमआरआई, ईसीजी, आखों की जांच से इसके बारे में जल्दी पता चल जाता है। इसके लक्षण यदि व्यक्ति का शरीर अकड़ने लगे, हाथ पैरों में झटके आने शुरू हो जाए, व्यक्ति अचानक खड़े-खड़े गिर जाए, मुंह से झाग आए, चक्कर या झनझनाट हो तो मिरगी का दौरा हो सकता है।
मिर्गी आने पर क्या न करें
अगर किसी में मिर्गी के दौरे आए हैं तो उनको जबरदस्ती न रोकें। दांतों के बीच जबरदस्ती कोई वस्तु न डाले। जिसने रोगी का दौरा देखा है, वो डाॅक्टर के पास अवश्य जाएं ताकि उसकी हिस्ट्री बता सके। दौरा पड़ने के बाद रोगी के कपड़े ढीले कर दें। नोकदार या गर्म चीज उसके पास से हटा लें। व्यक्ति सो रहा है तो सोने दें तथा आसपास लोगों को इकट्ठा न होने दें। मोटा कपड़ा मोड़कर सिर के नीचे रखें। चिकित्सक द्वारा बताई गई दवाई ठीक समय पर लें।