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उपायुक्त सहित 8 अधिकारियों पर मुकदमा

Tue, 30 Sep 2014 01:34 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, फतेहाबाद
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एनपीसीआईएल की आवासीय कॉलोनी के लिए गांव बड़ोपल में अधिग्रहण की गई जमीन पर पिछले वर्ष लगाई गई कंटीली तार से सात हिरणों की मौत के मामले में कुरूक्षेत्र की विशेष पर्यावरण अदालत ने एनपीसीआईएल के प्रोजेक्ट डायरेक्टर, चीफ इंजीनियर, तत्कालीन उपायुक्त, एसडीएम और वन्य सरंक्षण अधिकारी सहित 8 लोगों पर वल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 की धारा 2, 16 और 951 के तहत मुकदमा दर्ज किया है। सभी को 31 अक्तूबर तक के लिए सम्मन जारी किए हैं।
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अदालत में दाखिल मामले के अनुसार भारत सरकार ने गोरखपुर हरियाणा अणु विद्युत परियोजना के लिए 2010 से गांव गोरखपुर में 1313 एकड़ एवं गांव बड़ोपल में 185 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया था।

बड़ोपल गांव में अधिगृहित भूमि सदियों से काले हिरणों का प्राकृतिक आवास मानी जाती है। पिछले वर्ष 5 जुलाई से 14 जुलाई के दौरान में परमाणु संयंत्र कॉलोनी की बाड़बंदी के रूप में लगाई गई जाली के कारण चंद ही दिनों में सात हिरण मौत का शिकार हुए।
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2010 में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा एनपीसीआईएल को जारी टीओआर में तथा बाद में आयोजित मंत्रालय की एक्सर्ट एप्रेजल कमेटी की बैठकों में स्पष्ट रूप से वन्यजीवों की संरक्षण योजना बनाने को कहा गया।

लेकिन फरवरी 2013 में एनपीसीआईएल ने खंभे बनाने की फैक्टरी भी काले हिरणों के प्राकृतिक आवास के बीच लगाई। जिससे काले हिरणों में भगदड़ मची और उनकी जान को खतरा पैदा हो गया। 

फैक्ट्री को हटाने के लिए और पर्यावरण मंजूरी मिलने से पहले हिरणों को न खदेड़ने बारे जिला वन्य प्राणी अधिकारी व उपायुक्त को बिश्नोई समाज द्वारा शिकायत दी गई। जिस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।


एनपीसीआईएल ने मंत्रालय के निर्देशों को हवा में उड़ाते हुए काले हिरणों के संरक्षण की कोई योजना नहीं बनाई बल्कि उन्हें खदेड़ कर मारने की योजना बनाई ताकि सर्वे टीम आने तक कोई मुद्दा न रहे।

एनपीसीआईएल ने जुलाई में बाड़बंदी शुरू कर दी जिससें पहले बिश्नोई समाज व वन्यजीव प्रेमियों ने ऐसा न करने बारे लिखित अनुरोध किया लेकिन एनपीसीआईएल ने बाड़बंदी की जिससे सात हिरण मौत के मुंह में समा गए जिनमें दो मादाएं गर्भवती भी थीं।

सात हिरणों की मौत के दौरान बिश्नोई समाज द्वारा राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्युनल की शरण ली गई जिसके बाद 15 जुलाई 2013 को सभी संबंधित को नोटिस जारी हुए और एनपीसीआईएल को बाड़बंदी हटानी पड़ी।

लेकिन तब तक सात हिरण मारे जा चुके थे। हिरणों की मौत के लिए जिम्मेदार एनपीसीआईएल के खिलाफ  शिकायत की गई लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

कई दिनों तक गांव बड़ोपल में बिश्नोई समाज के लोगों द्वारा धरना दिया गया लेकिन धरने की सुध भी किसी अधिकारी ने नहीं ली।

पर्यावरण एवं जीव रक्षा बिश्नोई सभा के सचिव विनोद कुमार कड़वासरा द्वारा द्वारा वन्यप्राणी सुरक्षा अधिनियम 1972 की धारा 55 के तहत दोषियों के खिलाफ  कार्रवाई हेतु 60 दिन का नोटिस दिया गया जिसकी अवधि फरवरी 2014 में पूरी हुई लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इसके बाद याचिकाकर्ता द्वारा कुरूक्षेत्र स्थित विशेष पर्यावरण की शरण ली गई जहां से अब आरोपियों के खिलाफ  सम्मान जारी हुए हैं।

पर्यावरण एवं जीव रक्षा बिश्नोई सभा हरियाणा के उपप्रधान ने जानकारी देते हुए बताया कि कुरूक्षेत्र स्थित विशेष पर्यावरण अदालत के पीठासीन अधिकारी हेमराज वर्मा ने गोरखपुर हरियाणा अणु विद्युत परियोजना के निदेशक टीआर अरोड़ा चीफ इंजीनियर संजय कुमार गुमास्ता ठेकेदार एमके शर्मा, तत्कालीन डीसी साकेत कुमार, एसडीएम बलजीत सिंह, मुख्य वन्यजीव संरक्षक हरियाणा डा. अमैन्दर कौर मंडलीय वन्य प्राणी अधिकारी शक्ति सिंह, जिला वन्य प्राणी अधिकारी द्वारका प्रसाद को सम्मन जारी करते हुए सुनवाई की अगली तारीख 31 अक्तूबर 2014 दी है।


बिश्नोई समाज की तरफ से गांव बड़ोपल निवासी विनोद कड़वासरा बिश्नोई ने गत वर्ष परमाणु संयंत्र कॉलोनी की बाड़बंदी के कारण मरे काले हिरणों के लिए याचिका दायर की थी जिस पर विशेष अदालत ने संज्ञान लेते हुए वन्यप्राणी सुरक्षा अधिनियम 1972 की धारा 2 उपधारा 16ए धारा 9 व धारा 51 के तहत सम्मन जारी किया है।

ज्ञात हो कि वन्यप्राणी सुरक्षा अधिनियम 1972 के तहत काला हिरण अनुसूचि एक का वन्यजीव है जिसका शिकार हरियाणा में प्रतिबंधित है तथा हरियाणा का राज्य पशु है। इस अपराध के तहत शिकार करने, शिकार में सहायक बनने पर सात साल तक की सजा व जुर्माने का प्रावधान है. एडवोकेट धर्मवीर पुनिया
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