फतेहाबाद। छठ महापर्व के दूसरे दिन बुधवार को खरना पूजा की गई। श्रद्धालुओं ने 36 घंटे का उपवास शुरू किया। इसको लेकर बुधवार को भी श्रद्धालुओं ने जरूरत के सामान की जमकर खरीदारी की।
सूर्य को अर्घ्य देने के लिए गांव पीलीमंदोरी के पास छोटा घाट तैयार किया गया है, जबकि शहर के लोगों ने अंजली कॉलोनी में गड्ढा खोदकर घाट की व्यवस्था की है। छठ पर्व शुक्रवार सुबह सूर्योदय को अर्घ्य देने के साथ समाप्त होगा। फतेहाबाद अनाज मंडी में आए बिहार निवासी विष्णु, लालूराम, सुभाष, हरीश, नीलेश और जगतपाल आदि ने बताया कि छठ पर्व सबसे प्रमुख त्योहार है। यहां काम करने वाले लोग अपना काम छोड़कर घर नहीं जा सकते हैं। प्रशासन को नहरों पर घाट बनाने चाहिए ताकि छठ महापर्व मनाने में किसी भी प्रवासी को परेशानी न हो। फतेहाबाद शहर में घाट नहीं होने के कारण प्रवासियों को खुद अपने स्तर पर घाट तैयार करना पड़ रहा है।
- ग्रामीण क्षेत्र के श्रद्धालुओं ने गांव पीलीमंदोरी के पास तैयार किया छोटा घाट, शहर में अंजलि कॉलोनी में गड्ढा खोदकर बनाया
छठ मैया को अर्पित किया भोग
श्रद्धालुओं ने बताया कि छठ पूजा के दूसरे दिन खरना होता है। इस दिन छठ मैया को रोटी, गुड़ की खीर और विभिन्न फलों का भोग अर्पित किया जाता है। भोग अर्पित करने के बाद इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। मंगलवार से छठ महापर्व प्रारंभ हो चुका है। इस पर्व की शुरुआत नहाय खाय से हुई। बुधवार को खरना पूजा की गई। खरना को लोहंडा भी कहा जाता है। इस दिन का छठ पर्व में विशेष महत्व है। इस अवसर पर भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के लिए प्रसाद तैयार किया जाता है। शाम को पूजा का आयोजन किया गया। इसके बाद गुड़ की खीर और आटे की रोटी बनाई गई, जिसे प्रसाद के रूप में वितरित किया गया। व्रती महिलाओं ने प्रसाद के रूप में सबसे पहले इस खीर को ही ग्रहण किया। उसके बाद इसे लोगों में बांटा गया।
36 घंटे का रखा जाता है निर्जला व्रत
बिहार निवासी शंकरलाल, गोबिंद व महेश कुमार ने बताया कि छठ पर्व पर भोजन के रूप में विशेष रूप से दाल, चावल, चने की दाल बनाई जाती है। छठ पूजा मुख्य रूप से सूर्य देव और छठ मैया की उपासना का पर्व है। इस दौरान 36 घंटे का निर्जला व्रत रखा जाता है। जिस दौरान श्रद्धालु डूबते और उगते सूर्य की पूजा करते हैं। मान्यता है कि सूर्य देव के आशीर्वाद से व्यक्ति को निरोगी जीवन प्राप्त होता है और छठ मैया की कृपा से निसंतान दंपतियों को संतान की प्राप्ति होती है। संतान के सुखी जीवन के लिए भी यह व्रत रखा जाता है। इसके रखने से मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है।