अशोक नगर स्थित राजकीय माध्यमिक स्कूल शहर का ऐसा स्कूल है। जहां 750 विद्यार्थियों पर मात्र 5 ही कमरे हैं। यहां आठवीं तक कक्षाएं लगती हैं। इन आठ कक्षाओं को 12 अध्यापक पढ़ाते हैं। यहां छात्रों के बैठने के लिए मात्र पांच क्लास रूम, जिनमें 750 विद्यार्थी बैठने को मजबूर हैं।
इतना ही नहीं मिड डे मील बनाने वाले भी बच्चों की क्लास में ही बैठकर काम करते है। बरामदे में ही नहीं बल्कि प्रिंसिपल के रूम में भी कक्षाएं लगती हैं। समर विकेशन के बाद यहां मानसून शुरू हो जाता है। जो कि किसी विकेशन से कम नहीं है। इसका कारण है कि यहां पानी गिरने पर हो जाती है।
अशोक नगर के राजकीय माध्यमिक स्कूल को पहली से लेकर आठवीं तक दर्जा प्राप्त है। यहीं पर सभी कक्षाएं लगती हैं। यहां छात्रों की कुल संख्या 750 है। जगह की कमी के कारण तीन कक्षाएं पेड़ के नीचे व बरामदे में लगती हैं। चूल्हों से निकलने वाला धूंआ बच्चों को खूब रुलाता है। अगर बरसात आ जाए तो ‘मानसून होली-डे’ शुरू हो जाता है। छात्र अपने घर और अध्यापक अपने घर।
स्कूल में नहीं शौचालय
स्कूल में छात्रों व अध्यापकों के लिए एक भी शौचालय नहीं हैं। ‘आपात’ स्थिति में भी अध्यापकों तक को स्कूल के बाहर शौच के लिए जाना पड़ता है। यहां 12 टीचर हैं। एक क्लास रूम में दो-दो कक्षाओं को पढ़ाना इनकी मजबूरी है। एक ही क्लास रूम में तीसरी व सातवीं की कक्षाएं लगती हैं। जिन्हें अलग-अलग टीचर पढ़ाते हैं। एक टीचर की आवाज दूसरे को तो एक कक्षा की आवाज दूसरी कक्षा के छात्रों को ‘डिस्टर्ब’ करती हैं। ऐसे में छात्रों को सिलेबस की क्या समझ आता होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
तीन महीने पूर्व यहां आठ क्लासरूम थे। इनमें से तीन जर्जन हो चुके थे। प्रशासन ने किसी हादसे की आशंका के चलते उन्हें तोड़ने की अनुमति दे दी। उसके बाद बचे पांच क्लास रूम इन्हीं पांचों में ही फिलहाल पढ़ाई चल रही है। तीन महीने हो गए। इतने में कमरों का मलवा तक नहीं उठा तो नए कमरे बनने की बात सोचना मुश्किल ही है।
बच्चों को नहीं मिलता पर्याप्त पानी
स्कूल में बच्चों के लिए पानी के लिए प्लास्टिक की टंकी लगी है। लेकिन इसमें आने वाला पानी गर्म होता है। कभी कभार तो पानी आता ही नहीं है। बच्चे अपने घरों से बोतल में पानी भर कर लाते हैं।
प्रार्थना में होती धक्का-मुक्की
स्कूल का आकार छोटा होने के कारण स्कूल के सभी बच्चे प्रार्थना सभा में एक साथ खड़े भी नहीं हो पाते। जब बच्चे खड़े होते है काफी देर तक धक्का-मुक्की चलती रहती है।
स्कूल के सीनियर टीचर समुद्र सिंह ने बताया कि विद्यालय की इतनी तंग जगह से छात्रों व अध्यापकों सभी को परेशानी उठानी पड़ रही है। उन्होंने स्कूल प्रबंधक कमेटी से लेकर डीसी व उच्च अधिकारियों को इस बाबत कई बार पत्र लिखा है। लेकिन प्रशासन इस बारे गंभीर नहीं लगता।
जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी यज्ञ दत्त वर्मा ने कहा कि शुक्रवार को उन्होंने स्कूल का दौरा किया था। स्कूल के छात्रों को दयनीय हालात में पढ़ना पढ़ रहा है। असल में वहां 20 कमरे होने चाहिए। उन्होंने एसएमसी से प्रपोजल मांगा है। उनके पास स्कूल के लिए एक स्कीम है जिसके तहत दो कनाल जगह लेकर सरकार को प्रपोजल भेजेंगे।