जनता के पैसे को नगर निगम अधिकारी पानी की तरह बहा रहे हैं। जो काम अधिकारियों को करना चाहिए वे उसे आउटसोर्स कर रहे हैं। इसका बड़ा उदाहरण ई-टेंडरिंग है। जब तक टेंडर का काम मैनुअल था यह सब अधिकारी और कर्मचारी करते थे लेकिन ई-टेंडरिंग होते ही अधिकारियों ने हाथ खड़े कर दिए।
कायदे से यह काम नगर निगम के अधिकारियों व कर्मचारियों को करना चाहिए लेकिन इसके लिए एक निजी एजेंसी को ठेका दे दिया गया। जबकि सभी बड़े अधिकारियों के पास कंप्यूटर ऑपरेटर भी हैं। अधिकारियों के इस रवैये से जनता का पैसा बर्बाद हो रहा है। नगर निगम में टेंडर का काम देख रही कंपनी एक टेंडर के लिए 400 रुपये तक फीस लेती है। काम पर आने वाली लागत की 10 फीसदी रकम ठेकेदार से अपने खाते में जमा करवाती है।
उसमें से अपनी फीस काटकर बाद में निगम को शेष पैसा वापस करती है। पार्षद यह सवाल उठा रहे हैं कि यह काम अधिकारियों और कर्मचारियों का है तो उसके लिए किसी कंपनी को ठेका क्यों दिया जा रहा है। निजी एजेंसी को अधिकारी अपने वेतन से पैसे देें न कि विकास के लिए एकत्र की गई रकम से।
अधिकारियों का कहना है कि उन्हें ई-टेंडरिंग का ज्ञान नहीं है। इसलिए ऐसा करवाना पड़ रहा है।
अब सरकार ने निगम अधिकारियों को ई-टेंडरिंग की ट्रेनिंग देने का फैसला किया है। कार्यकारी अभियंता स्तर के अधिकारियों को ट्रेनिंग दी जाएगी, ताकि पैसे की बर्बादी न हो। शहरी स्थानीय निकाय के निदेशक की ओर से निगम प्रशासन को इस बारे में निर्देश मिले हैं। अगले 10 दिन में अधिकारियों की जानकारी मांगी गई है, जिससे ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू हो सके। इस बात की पुष्टि निगम आयुक्त कार्यालय ने भी की है।
- अजय सिंह बैंसला सहित कई पार्षद सदन की बैठक में यह मुद्दा उठा चुके हैं। इस बार भी यह मुद्दा उठेगा। पार्षद का कहना है कि जो काम अधिकारियों को करना चाहिए, उसे करने के लिए जनता के पैसे फूंके जा रहे हैं। एक टेंडर में यदि पार्टी नहीं आती है तो निजी कंपनी उसी के लिए दोबारा पैसे लेती है।
- निगम के कार्यकारी अभियंता रमेश बंसल का कहना है कि निगम में ई-टेंडरिंग का काम नैक्स्ट टेंडर प्रा.लि. कंपनी कर रही है। अब अधिकारियों को भी इसकी ट्रेनिंग दी जाएगी।
‘पहले टेंडर डालने की प्रक्रिया मैनुअल थी, तब ठेकेदार धांधली करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब प्रतियोगिता बढ़ने के कारण हम सस्ते में काम करवा रहे हैं।’
- मुकेश शर्मा, सीनियर डिप्टी मेयर।