फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Charkhi Dadri News: पकाव के समय बारिश नहीं होने से मोटा अनाज बाजरा की पैदावार में 40 से 55 प्रतिशत तक गिरावट आने का अनुमान

Sat, 29 Aug 2026 12:35 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
विज्ञापन
खेतों में खड़ी बाजरा की फसल।  - फोटो : 1
विज्ञापन
चरखी दादरी। जिले में इस बार पकाव के समय बारिश न होने की वजह से बाजरे की औसत पैदावार में 40 से 55 प्रतिशत तक कमी आने का अनुमान है। 5.30 लाख क्विंटल तक संभावित पैदावार इस बार तीन लाख क्विंटल तक सिमटने का आकलन जताया जा रहा है। इस बार बाजरा का बीजित क्षेत्र एक लाख 34 हजार हेक्टेयर क्षेत्र है। किसान संगठनों ने सूखाग्रस्त घोषित कर सरकार से मुआवजा देने की मांग की है।
विज्ञापन

गौरतलब है कि आजकल किसान बाजरा की हाइब्रिड किस्म के बीज का इस्तेमाल करते हैं। आमतौर पर बाजरा की सरकारी खरीद एक अक्तूबर से शुरू होती है। इस बार जिला में बाजरा की अगेती व पछेती दोनों बिजाई हुई थी। ऐसे में अगेती फसल पकाव की अवस्था में है। खासकर रेतीला एरिया में बाजरा की फसल जल्द तैयार होती है। बाजरा को सरकार ने मोटा अनाज की श्रेणी में शामिल कर रखा है ऐसे में इस बार भी बाजरा की मांग ज्यादा ही बने रहने की उम्मीद है। सरकार ने तीनों सेनाओं में जवानों के भोजन में भी मोटा अनाज से बने उत्पाद शामिल कर रखा है।
10 क्विंटल तक पैदावार का आकलन
इस बार अब तक पर्याप्त मात्रा में बारिश नहीं होने की वजह से बाजरा का पकाव ठीक प्रकार से हो नहीं हो सकेगा। बाजरा की प्रति एकड़ नौ से 10 क्विंटल तक औसत पैदावार मानी जाती है जबकि इस बार इसमें गिरावट आने का अनुमान है। सरकार सरकार मेरी फसल,मेरा ब्योरा पोर्टल पर पंजीकृत किसानों का ही बाजरा खरीदती है। अब तक 80 प्रतिशत किसानों ने इस पोर्टल पर पंजीकरण करवा रखा है। 20 सितंबर के बाद बाजरा की अगेती कटाई शुरू हो जाती है। सरकार एक हर साल एक अक्तूबर से बाजरा की सरकारी खरीद करती है।
विज्ञापन

हाइब्रिड किस्म की बिजाई ज्यादा
गत पांच-छह साल से बाजरा की खेती के प्रति किसानों का रुझान बढ़ा है। अब तो बाजरा का सरकारी रेट भी बढ़िया है। इस फसल में लागत खर्च कम आता है। बाजरा की हाइब्रिड किस्म की ज्यादा बिजाई की जाती है। हाइब्रिड किस्म के बीज से प्रति एकड़ 10 क्विंटल तक पैदावार मिल जाती है जबकि देशी किस्म की औसत पैदावार सात से आठ क्विंटल प्रति एकड़ तक होती है। पुराने समय में लोग बाजरा, ज्वार, चना, जौ की रोटी खाते थे। उस समय सिंचाई के संसाधन न होने की वजह से गेहूं की पैदावार नहीं होती थी।
कपास की फसल सूखने लगी
बारिश नहीं होने से किसानों की नकदी माने जाने वाली कपास की फसल सूखने लगी है। इसकी पैदावार को भी बड़ा झटका लगा रहा है। कपास में प्रति एकड़ लागत खर्च भी ज्यादा आता है। इसी प्रकार ग्वार की फसल का भी यही हाल है। पौधों के पत्ते सूखकर गिरने लगे हैं। खासकर रेतीला एरिया में हालात विकट बने हुए हैं। किसान नरेश कुमार व कलेराम का कहना है कि इस बार तो सूखे से भी विकट हालात बन गए हैं। किसान फसलों पर काफी बजट खर्च कर चुका है, अब पैदावार मिलने का संकट पैदा हो गया है। कपास का बीजित रकबा करीब 25 हजार हेक्टेयर है।
कोट:
बाजरा की फसल में 55 प्रतिशत तक नुकसान होने का अनुमान है। अंतिम समय में बारिश नहीं होने से आधी मात्रा में ही दाना का पकाव मुश्किल से हो पाएगा। ग्वार व कपास सूखने लगी है। सरकार को सूखा घोषित कर प्रति एकड़ 50 हजार रुपये मुआवजा देना चाहिए। बाजरा की पछेती फसल में तो 100 प्रतिशत नुकसान है। सरकार को फसलों की स्पेशल गिरदावरी करवानी चाहिए।हरपाल सिंह भांडवा, जिला अध्यक्ष, भाकियू

बाजरा की इस बार औसत पैदावार घटने का अनुमान है। पकाव के समय बारिश नहीं होने से नुकसान हो रहा है। इस समय बाजरा की फसल को सिंचाई की जरूरत है।कृष्ण कुमार, एसडीओ, कृषि विभाग।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें