चरखी दादरी। होली पर्व को लेकर पुराने जमाने जैसी बात एवं चहल-पहल नहीं रही। पहले एक माह पहले होली पर्व को लेकर चाव चढ़ जाता था। आज के इस चकाचौंध एवं भौतिकतावादी युग में त्योहारों के मायने ही बदल गए हैं। आज गांव की चौगानों में होली के गीत गूंजते नहीं सुनते। होली से एक माह पहले महिलाएं गांवों में रात के समय चौक में खेल खेलती थी।
क्षेत्र की बुजुर्ग महिलाओं का मानना है कि पुराने जमाने में होली पर्व पर एक माह पहले गांव की चौगानों में महिलाएं लूर डालकर खेला करती थीं। छोरियां देर रात तक होली खेलती थी। फाग के दिन गांव के चौक में पानी की कढ़ाई रखकर कोरड़ा से होली खोली जाती थी। बुजुर्ग महिलाओं का कहना है कि आज होली खेलने के तौर-तरीके ही बदल गए हैं। आज समाज में आपसी द्वेष भावना बनी हुई है। पहले लोगों में आपस में प्यार व एक-दूसरे की मदद करते थे। महिलाएं फाल्गुन के गीत गाती थी। पानी से भरी कढ़ाई पर कोरड़ा से खेलते समय महिलाएं देवर से गुड़ की भेली मांगती थी। कोरड़ा सण की मोटी जेवड़ी का बना होता था।
पहले कई दिन पहले खेलने लगते थे होली, अब तो दिन के दिन भी वो बात नहीं
पहले एक माह पहले होली खेलना शुरू हो जाता था। महिलाएं एवं लड़कियां देर रात तक गांव की चौगानों में खेलती थी। आपस में गीत गाते हुए लूर डालती थी। हरियाणवी संस्कृति पर आधारित गीत गाए जाते थे। होली के दिन महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा पहनकर होलिका पूजा करती थी। होलिका पूजन के दौरान समूह में महिलाएं गीत गाती थी। होली पर महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा धारण करती थी।
-वेद कौर रावलधी, 80 वर्ष
आज होली ही नहीं सभी त्योहारों के मायने ही बदल गए हैं। होली दहन पंडित मुहूर्त देखकर करता था। आज होलिका दहन मनमर्जी से कोई भी कर देता है। फाग के दिन महिलाएं चौक में पानी की कढ़ाई रखकर कोरड़ा से होली खेलती थी। एक माह पहले फागण के गीत गाने शुरू हो जाते थे। कोरड़ा व पानी से होली खेली जाती थी। आज सब कुछ बदल गया है।
कृष्णा देवी, छोटी बाजारी
-होली पर्व के दिन बहुएं बुजुर्ग महिलाओं से आशीर्वाद लेती थी। होलिका पूजन के दौरान महिलाएं मांगलिक गीत गाकर नृत्य करती थी। फागण के गीत गाए जाते थे। होली के गीतों में परिवार के सदस्यों के नाम लेकर मनोकामनाएं एवं दीर्घायु की कामना की जाती थी। उस समय आपस में प्रेमभाव था। लोग बुरा नहीं मानते थे। महिलाएं कोरड़ा मारते हुए गुड़ की भेली की मांग करती थी।
संतरा देवी, पुराना झज्जर रोड
होली के दिन घरों में शक्कर-चावल बनाए जाते थे। परिवार के लोग इक्ट्ठे बैठकर भोजन करते थे। होलिका दहन के समय बुजुर्ग लोग मौजूद होते थे। दहन के समय भी महिलाएं होलिका को जल से अर्घ्य देकर मन्नतें मांगती थी। आज जमाना बदल गया है। आजकल की लड़कियों को होली के गीत ही याद नहीं हैं। हरियाणा की संस्कृति को बचाने की जरूरत है।