चरखी दादरी। स्वयं सहायता समूह न केवल ग्रामीण महिलाओं बल्कि शहरी महिलाओं में भी आत्मनिर्भरता की अलख जगा रहा है। दादरी के वार्ड 8 झज्जर घाटी क्षेत्र निवासी मोनिका इसका एक उदाहरण हैं। मोनिका ने शहरी विकास स्वयं सहायता समूह के साथ जुड़कर न केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि मिट्टी के बर्तन बनाकर कमाई का एक मजबूत साधन भी तैयार कर लिया है। घरेलू जिम्मेदारियों के साथ व्यवसाय करना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन मेहनत, लगन और सीखने की इच्छा ने उन्हें सफलता के रास्ते पर आगे बढ़ाया।
गिलास, प्लेट सहित विभिन्न बर्तन की कर रहीं बिक्री
मोनिका मिट्टी से विभिन्न प्रकार के उत्पाद तैयार करती है और अन्य राज्यों से मंगवाती है। इनमें गिलास, प्लेट, फिल्टर व अन्य घरेलू उपयोग के बर्तन शामिल हैं। पहले यह सिर्फ एक शौक था, लेकिन समूह के सहयोग और नगर परिषद द्वारा उपलब्ध करवाए जा रहे मंच ने इसे आय का साधन बना दिया। मोनिका बताती हैं कि मिट्टी के बर्तनों की मांग लगातार बढ़ रही है क्योंकि लोग अब स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति जागरूक हो रहे हैं। प्लास्टिक के बर्तनों की जगह मिट्टी से बने उत्पादों को प्राथमिकता मिल रही है।
नगर परिषद उपलब्ध करवा रहा मंच
नगर परिषद की ओर से उन्हें अलग-अलग आयोजनों में स्टॉल लगाने का अवसर दिया जाता है। हाल ही में आयोजित गीता जयंती महोत्सव में भी उन्होंने स्टॉल लगाई और विभिन्न कार्यक्रमों में भी मोनिका द्वारा अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाई जा रही है। जहां उनके उत्पादों को काफी सराहना मिली। इसके अलावा त्योहारों, मेलों और विशेष आयोजनों के दौरान उन्हें मंच मिलता है जिससे बिक्री और बढ़ जाती है। मोनिका बताती हैं कि पहले वह घर में सिर्फ अपना काम करती थीं, लेकिन अब वह अपने उत्पादों को न सिर्फ स्थानीय स्तर पर बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी बेच रही हैं।
स्वयं सहायता समूह कर रहा मदद
स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद मोनिका को प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और प्रबंधन से जुड़े कई महत्वपूर्ण टिप्स भी मिले, जिसने उनके व्यवसाय को आकार दिया। आज मोनिका की पहचान सिर्फ एक गृहिणी की नहीं बल्कि एक सफल उद्यमी के रूप में हो चुकी है। उनका सपना है कि आने वाले समय में वह और अधिक महिलाओं को इस व्यवसाय से जोड़ें, ताकि वे भी आर्थिक रूप से सक्षम बन सकें।
अगर महिला चाहे तो वह घर बैठे भी बेहतर कमाई कर सकती है। जरूरत सिर्फ सही दिशा और समर्थन की होती है। मिट्टी के बर्तनों का काम करने से उन्हें आत्मसंतुष्टि मिलती है क्योंकि यह कला और परंपरा दोनों के संरक्षण का माध्यम है।
- मोनिका, झज्जर घाटी क्षेत्र निवासी।