चरखी दादरी। पुराना बस स्टैंड पर चल रही रासलीला के नौवें दिन कृष्ण-सुदामा के चरित्र का मंचन किया गया। लीला के माध्यम से दर्शाया गया कि भगवान कृष्ण बाल्यकाल में गुरुकुल जाकर ऋषि संदीपन से विद्या ग्रहण करते हैं।
जब भगवान कृष्ण ने अपने गुरु को परिचय दिया तो ऋषि संदीपन को स्मरण हो आया कि पूर्व में उनके गुरु ने बताया था कि एक दिन स्वयं भगवान उनके पास शिक्षा ग्रहण करने आएंगे। वहीं दिन आ गया था। एक अवसर पर गुरुदेव सभी शिष्यों से पाठ सुन रहे थे। जब सुदामा की बारी आई तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे पाठ भूल गए हैं।
इस पर गुरुजी ने उन्हें दंडस्वरूप वन से लकड़ी लाने भेजा। तत्पश्चात जब कृष्ण से पाठ सुनाने को कहा गया तो उन्होंने भी यही कहा कि वे पाठ भूल गए हैं। परिणामस्वरूप दोनों को ही गुरुजी ने दंड देकर वन से लकड़ी लाने भेजा और साथ में थोड़े गुड़-चना दिए।
वन में लकड़ी काटते-काटते सुदामा को भूख लगी और उन्होंने दोनों का हिस्सा स्वयं ही खा लिया। जब कृष्ण ने अपने हिस्से का गुड़-चना मांगा तो सुदामा ने स्वीकार किया कि उन्होंने सब खा लिया। दोनों ने यह बात गुरुजी को बताई तो उन्होंने सुदामा को बड़ा अपराधी मानते हुए दीन-हीन और गरीबी का श्राप दिया, साथ ही कृष्ण से कहा कि जब भी सुदामा उनके पास आए तो उन्हें इस श्राप से मुक्ति अवश्य देना।
समय बीतने पर भगवान कृष्ण द्वारका के राजा बने और सुदामा गरीब ब्राह्मण के रूप में जीवन व्यतीत करने लगे। अत्यधिक गरीबी से व्यथित होकर पत्नी के आग्रह पर चावल लेकर अपने मित्र कृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे। सुदामा के आगमन का समाचार पाकर भगवान कृष्ण नंगे पांव महल से बाहर दौड़कर अपने मित्र को लेने पहुंचे।
उन्होंने हर्षपूर्वक सुदामा का स्वागत किया। उनके पैर अपने आंसुओं से धोए और चावल की पोटली में से प्रेमपूर्वक दो मुट्ठी खा लिए। जब वे तीसरी मुट्ठी खाने लगे तो रुक्मिणी ने उनका हाथ रोक लिया। इन दो मुट्ठियों के बदले सुदामा को दो लोक का स्वामी बना दिया।
कलाकारों का भावपूर्ण मंचन देखकर दर्शक भाव-विभोर हो गए। मंचन के दौरान प्रधान फूलचंद सोनी, रामविलास जांगड़ा, महावीर कौशिक, मुकेश सोनी, नरेश मित्तल, एडवोकेट संजीव मरहटा, कर्मवीर जागड़ा, वेदपाल जाखड़ उपस्थित रहे।