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पालक की आर-ग्रीन किस्म से किसान ले सकते हैं पांच से छह कटाई

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चरखी दादरी। किसान अक्तूबर माह में मेथी व पालक की बिजाई कर अच्छी पैदावार लेकर मुनाफा कमा सकते हैं। इसके लिए किसानों को बिजाई से पहले खेत समतल करना होगा। पालक आर-ग्रीन किस्म से किसान पांच से छह कटाई ले सकते हैं जबकि जोरिया ग्रीन सबसे उत्तम किस्म है। इसी प्रकार मेथी की सबसे बेहतर किस्म उषा अग्निपंथ मानी जाती है।
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पालक की प्रतिदिन कटाई कर किसान मंडी में बिक्री कर दैनिक आय ले सकते हैं। पालक की बिजाई का यह अनुकूल समय है। पालक की जोरिया ग्रीन किस्म के पत्ते गहरे हरे रंग के होते हैं। इन पत्तों में रस होता है जिससे बाजार में भाव भी अच्छा मिलता है। नहर व ट्यूबवेल के पानी से पालक की सिंचाई की जा सकती है। किसान इसकी पांच से छह कटाई ले सकते हैं। पालक की बिजाई छिड़काव रूप में किसानों को करनी चाहिए।
पालक की दूसरी किस्म आर-ग्रीन है। इसके पौधे की पत्तियां कोमल व रसीली होती हैं। इसकी पहली कटाई 30 दिन में मिल जाती है। उसके बाद कुछ दिन के अंतराल में कटाई ली जा सकती है। इससे भी किसान पांच से सात कटाई ले सकता है। पालक की कटाई ज्यादा लेने पर जमीन को खुराक की भी जरूरत होती है ऐसे में जमीन को सभी आवश्यक पोषक तत्व मिलने चाहिए। एक एकड़ में कम से कम आठ से 10 ट्रॉली देसी गोबर की खाद डालनी चाहिए। इसमें एक से डेढ़ बैग सिंगल सुपर फास्फोरस भी देना चाहिए।
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आठ से 10 क्विंटल प्रति एकड़ संभव है मेथी की पैदावार
किसान मेथी की बिजाई अक्तूबर माह में कर सकते हैं। मेथी की पहली किस्म उषा अग्निपंथ है। इसके पौधे पर सफेद फूल आते हैं और फली लंबी होती हैं। इस किस्म से बीज भी तैयार किया जा सकता है। इसकी हरे रूप में कटाई करके बाजार में बिक्री की जा सकती है। इसकी औसत पैदावार आठ से 10 क्विंटल प्रति एकड़ तक संभव है। इसी प्रकार मेथी की दूसरी किस्म- किसान सोनाली है। इसका दाना मोटा होता है और इसकी पैदावार भी आठ से 10 क्विंटल तक ली जा सकता है। मेथी की एक और किस्म-हिसार मुक्ता है। इसकी पैदावार भी आठ से 10 क्विंटल ली जा सकती है। इसकी की एक अन्य किस्म कसूरी मेथी है, जिसके पौधे की लंबाई ज्यादा होती है। इसका फूल पीला होता है।
किसान मेथी की बिजाई अक्तूबर में कर सकते हैं। इसके लिए खेत समतल हो ताकि सिंचाई में दिक्क्त न आए और सभी पौधों की सिंचाई आसानी से हो सके। पालक की कटाई कर किसान प्रतिदिन बिक्री कर मुनाफा ले सकते हैं।
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डॉ. जितेंद्र सिहाग, तकनीकी कृषि अधिकारी
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