चरखी दादरी। सिविल अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती होते ही स्वास्थ्य विभाग ने बच्चों के उपचार की सुविधाओं में इजाफा करना शुरू कर दिया है। इसी क्रम में हाल ही में नागरिक अस्पताल में बच्चों के लिए 24 बेड का अस्थायी वार्ड तैयार किया गया है। इससे अब बीमार बच्चों को अस्पताल में भर्ती करने का रास्ता साफ हो गया है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार बच्चों के वार्ड में वेंटिलेटर की भी सुविधा है और गंभीर स्थिति में भी यहां उपचार हो सकेगा।
बता दें कि प्रदेश सरकार ने वर्ष 2016 में दादरी को जिला घोषित किया था। वहीं, वर्ष 2018 में दादरी स्वास्थ्य विभाग भिवानी से अलग हुआ। इसके बाद से ही बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती के लिए जिला स्वास्थ्य विभाग की ओर से मुख्यालय डिमांड भेजी जा रही थी। 2018 से लेकर 30 अप्रैल 2023 तक स्वास्थ्य विभाग की ओर से 30 बार डिमांड भेजी गई। इतनी दफा किए गए प्रयास आखिरकार रंग लाए और गत 19 मई को डॉ. सुमित कटारिया ने बतौर बाल रोग विशेषज्ञ दादरी में ज्वाइन किया। इसके बाद विभाग ने यहां बच्चों के उपचार की व्यवस्थाएं करने की कवायद शुरू की और बच्चों का विशेष वार्ड बनाना भी इसी का हिस्सा है।
डॉ. कृष्ण कुमार ने बताया कि बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती होने के बाद अब बच्चों को दादरी सिविल अस्पताल से रेफर करने का झंझट खत्म हो गया है। उन्होंने बताया कि अब जल्द ही विशेषज्ञ को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने पर फोकस रहेगा, ताकि बच्चों के उपचार में कोई बाधा न आए। उन्होंने बताया कि जिले में करीब अस्सी हजार बच्चे हैं। विभाग ने सिविल अस्पताल में बच्चों के उपचार के लिए अस्थायी वार्ड तैयार कर दिया है। उन्होंने बताया कि बाल रोग विशेषज्ञ प्रतिदिन करीब 30 से 35 की ओपीडी देख रहा है।
- हर साल एक हजार बच्चे लेते हैं जन्म
दादरी जिले की बात करे तो हर साल करीब एक हजार बच्चे जन्म लेते हैं। इनमें से 70 फीसदी डिलिवरी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर और 30 प्रतिशत प्राइवेट अस्पतालों में होती है। कई दफा नवजात की तबीयत बिगड़ने पर उसे रेफर करना ही विकल्प होता था, लेकिन बाल रोग विशेषज्ञ मिलने के बाद अब ऐसा नहीं होगा।
- बाल-शिशु नर्सरी की सुविधा भी मिलेगी जल्द
जिला स्वास्थ्य विभाग ने मातृ-शिशु अस्पताल में बाल-शिशु नर्सरी खोलने की योजना तैयार कर रखी है। इसके लिए सरकार की ओर से करीब डेढ़ करोड़ का बजट भी विभाग को दिया जा चुका है। विभाग यह बजट पीडब्ल्यूडी को ट्रांसफर कर चुका है। पीडब्ल्यूडी ने भी टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी है। जल्द ही मातृ-शिशु अस्पताल में बाल-शिशु नर्सरी निर्माण की कवायद शुरू हो जाएगी।
- सिविल अस्पताल में सुविधा न होने से निजी अस्पताल पर निर्भर थे अभिभावक
सिविल अस्पताल में बच्चों के उपचार की सुविधा न होने से अभिभावक शहर के पांच निजी अस्पतालों पर निर्भर थे। विभागीय सूत्रों की मानें तो एक अस्पताल की दैनिक ओपीडी औसतन 40 रहती थी और प्रति बच्चा ओपीडी फीस 150 से 200 रुपये निर्धारित है। इस दौरान कम से कम 200 रुपये की दवा भी दी जाती थी। इस लिहाज से एक बार उपचार पर करीब 350 रुपये खर्च आता है। ऐसे में एक अस्पताल में प्रतिदिन 14 हजार और एक माह में करीब चार लाख बीस हजार की आय होती थी।
सिविल अस्पताल में बच्चों के लिए 24 बेड का अस्थायी वार्ड तैयार कर दिया है। यहां उनको भर्ती किया जा सकेगा। जल्द ही बाल-शिशु नर्सरी का निर्माण शुरू हो जाएगा और इसके बाद बच्चों के उपचार की सुविधाओं में और इजाफा होगा।
-डॉ. कृष्ण कुमार, सीएमओ, चरखी दादरी