संवाद न्यूज एजेंसी
चरखी दादरी। जिले में जल संरक्षण और गिरते भूमिगत जलस्तर को सुधारने के उद्देश्य से अटल भू-जल योजना के तहत बनाए गए 80 जलकुंड इस बार कमजोर बारिश के कारण सूखे पड़े हैं। पर्याप्त पानी नहीं मिलने से करोड़ों की लागत से तैयार जलकुंड अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। इससे भूजल रिचार्ज योजना पर ब्रेक लग गया है।
सबसे अधिक जलकुंड बाढड़ा खंड के उन गांवों में बनाए गए हैं जहां भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है और कई स्थानों पर यह 75 से 91 मीटर की गहराई तक पहुंच चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर अच्छी बारिश नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में पेयजल और सिंचाई दोनों के लिए संकट और गहरा सकता है।
ऐसे में जल संरक्षण की योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन और वर्षा जल का अधिकतम संचयन बेहद जरूरी हो गया है। अटल भू-जल योजना के तहत करीब दो वर्ष पहले जिले में 80 जलकुंड तैयार किए गए थे। इनका मुख्य उद्देश्य मानसून के दौरान वर्षा जल का संग्रह करना, भूमिगत जल का रिचार्ज बढ़ाना और जरूरत पड़ने पर घरेलू कार्यों में इस पानी का उपयोग करना है। जलकुंडों की तलहटी को पक्का बनाया गया है तथा ऊपर से ढकने की व्यवस्था की गई है ताकि पानी लंबे समय तक सुरक्षित और उपयोग योग्य बना रहे। हालांकि इस बार पर्याप्त वर्षा नहीं होने से अधिकांश जलकुंड खाली पड़े हैं।
जल संरक्षण की यह व्यवस्था पड़ोसी राज्य राजस्थान के मॉडल से प्रेरित है। राजस्थान के कई गांवों में वर्षों से जलकुंडों में वर्षा जल संग्रहित कर पीने और घरेलू उपयोग के लिए सुरक्षित रखा जाता है। वहां यह व्यवस्था राहत का माध्यम बनी हुई है। इसी सोच के तहत हरियाणा में भी जलकुंड विकसित किए गए हैं ताकि भविष्य में जल संकट का सामना किया जा सके।
बाढड़ा क्षेत्र में सबसे गंभीर स्थिति
जिले का बाढड़ा उपमंडल भूमिगत जल संकट से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। यहां कई गांवों में भूजल स्तर 75 से 91 मीटर तक नीचे पहुंच चुका है। लगातार गिरते जलस्तर के कारण कई स्थानों पर पानी खारा और लवणीय होता जा रहा है जिससे वह न केवल पीने बल्कि सिंचाई के लिए भी कम उपयोगी रह गया है। पर्याप्त प्राकृतिक रिचार्ज नहीं होने के कारण स्थिति लगातार चिंताजनक बनती जा रही है।
भूजल बचाने के लिए किए जा रहे प्रयास
भूजल संरक्षण को लेकर सरकार की ओर से कई कदम उठाए गए हैं। गांवों में सोख्ता गड्ढों का निर्माण कराया गया है, रिचार्ज बोर बनाए गए हैं और वर्षा जल को जमीन में पहुंचाने की विभिन्न योजनाएं लागू की गई हैं। जलकुंड भी इसी अभियान की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इनका निर्माण ग्राम पंचायत और शामलात भूमि पर किया गया है ताकि वर्षा जल का अधिकतम संचयन हो सके और आसपास के क्षेत्र में भूजल स्तर में सुधार आए।
बारिश में आएंगे काम
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आगामी दिनों में अच्छी बारिश होती है तो ये जलकुंड न केवल जल संरक्षण में अहम भूमिका निभाएंगे बल्कि भविष्य में ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू उपयोग के लिए भी एक वैकल्पिक जल स्रोत साबित हो सकते हैं। फिलहाल जिले की नजरें मानसून की मेहरबानी पर टिकी हैं क्योंकि पर्याप्त वर्षा ही इन जलकुंडों को जीवन दे सकती है और भूजल संकट से राहत दिलाने की दिशा में प्रभावी साबित हो सकती है।
बारिश नहीं हुई है, इस वजह से जलकुंड भरे नहीं जा सके। जलकुंड नियमित रूप से भरे तभी फायदा मिल सकता है। इससे आसपास का भूमिगत जलस्तर भी ऊपर आ जा सकता है।
- रवि कुमार, जूनियर जल वैज्ञानिक, क्षेत्रीय प्रमुख।