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Chandigarh-Haryana News: दक्षिण हरियाणा में रोहिड़ा–जाटी पेड़ों के संरक्षण पर 500 रुपये पेंशन

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-प्राणवायु देवता पेंशन स्कीम की तर्ज पर नई योजना तैयार हो रही : राव नरबीर सिंह
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-प्रतिवर्ष 500 रुपये की राशि प्रदान की जाएगी, जिसे आगे वर्ष दर वर्ष बढ़ाया जाएगा

अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। हरियाणा में प्राणवायु देवता पेंशन स्कीम की तर्ज पर सरकार रोहिड़ा और जाटी पेड़ों के संरक्षण पर प्रति वर्ष 500 रुपये पेंशन देने की शुरुआत करने जा रही है। वन संपदा के संरक्षण को मजबूत बनाने के उद्देश्य से दक्षिण हरियाणा के विशेषकर महेंद्रगढ़, सतनाली, चरखी दादरी, बाढ़ड़ा, लोहारू क्षेत्रों में रोहिड़ा और जाटी के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए नई योजना तैयार की जा रही है। चंडीगढ़ में विभागीय अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक के दौरान वन एवं पर्यावरण मंत्री राव नरबीर सिंह ने यह जानकारी दी।

मंत्री ने कहा कि जिन किसानों के खेतों में रोहिड़ा और जाटी के पेड़ सुरक्षित रहेंगे, उन्हें प्रोत्साहन स्वरूप प्रतिवर्ष 500 रुपये की राशि प्रदान की जाएगी। इसे आगे वर्ष दर वर्ष बढ़ाया भी जाएगा। मंत्री ने निर्देश दिए कि इको टूरिज्म पॉलिसी के तहत मोरनी हिल्स में थापली और यमुनानगर के चुहड़पुर क्षेत्र में विस्तृत योजना तैयार कर वर्किंग ड्राफ्ट तैयार करे। साथ ही शिवालिक व अरावली क्षेत्र के लिए भी इको टूरिज्म पॉलिसी के अनुरूप कार्य योजना बनाई जाए और परियोजनाओं को पीपीपी मॉडल पर संचालित किया जाए। बैठक में बताया गया कि वन मित्र योजना के तहत गत वर्ष 71 हजार से अधिक गड्ढे खोदे गए और 5710 पौधे लगाए गए। मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि वन मित्रों को खाद एवं नलाई-गुड़ाई के लिए या तो वित्तीय सहायता प्रदान की जाए या विभाग की ओर से आवश्यक संसाधन उपलब्ध करवाए जाएं ताकि पौधों की देखभाल प्रभावी ढंग से हो सके और वन संपदा का विस्तार तेजी से आगे बढ़ सके।
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रोहिड़ा पेड़ों की विशेषता

हरियाणा के कुछ जिलों में मिलने रोहिड़ा एक औषधीय पेड़ है। इस पर अनार के पौधे की तरह लाल रंग के फूल लगते हैं। इसकी लगातार संख्या घट रही है। लकड़ी में प्रयोग करने के अलावा अनेक लोग इन्हें खेतों से फसल को नुकसान पहुंचाने के डर में हटा देते हैं जबकि यह फसल को लाभ पहुंचाता है।
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जांटी पेड़ों की विशेषता -

दक्षिणी हरियाणा का चंदन कहा जाने वाला जाटी का पेड़ लोक संस्कृति का अभिन्न भाग है। दक्षिणी हरियाणा के खेतों में बहुतायत में पाये जाने वाला यह बहुउपयोगी पेड़ यहां के तीज-त्योहारों से भी जुड़ा है। नवंबर-दिसंबर के मास में इस पेड़ की छंगाई की जाती है जिसमें पेड़ की लगभग सभी शाखाओं को काट दिया जाता है। इस छंगाई से एक ओर जहां सर्दियों में गेहूं, जौ, चने व सरसों की फसलों को पूरी धूप मिलती है वहीं इससे किसानों को ईंधन व चारा भी मिलता है।
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