निचली कोर्ट ने दी थी आजीवन कारावास की सजा
उन्होंने बताया कि राजीव गद्दी का वारिस बनना चाहता था, जबकि बाबा शिवनाथ उसे अपने शिष्य माया राम को सौंपना चाहते थे। इसी रंजिश में राजीव ने हत्या की। पुलिस ने इस कथित अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति को आधार बनाते हुए राजीव नाथ को गिरफ्तार किया।
2004 में निचली अदालत ने राजीव को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। राजीव ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसके चलते उसे 2009 में जमानत मिल गई। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए कहा कि पूरा मामला एक अतिरिक्त न्यायिक कबूलनामे पर आधारित था, जो कानूनी दृष्टि से कमजोर साक्ष्य है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि आरोपी वास्तव में दोषी था, तो वह एक महीने बाद खुद सरपंच के पास जाकर हत्या की बात क्यों स्वीकार करता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न तो कोई प्रत्यक्षदर्शी था, न ही राजीव नाथ को मृतकों के साथ आखिरी बार देखे जाने का कोई प्रमाण मिला।
पुलिस ने आरोपी से कोई हथियार या तेजाब भी बरामद नहीं किया। फिंगरप्रिंट रिपोर्ट भी किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई। कोर्ट ने कहा कि जब कोई मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित हो, तो उन साक्ष्यों की श्रृंखला इतनी मजबूत होनी चाहिए कि कोई अन्य निष्कर्ष संभव ना हो। लेकिन इस मामले में साक्ष्य अधूरे थे, और ऐसे में संदेह का लाभ आरोपित को दिया जाना न्यायसंगत है। हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष राजीव नाथ के खिलाफ आरोप साबित करने में असफल रहा और उसे दोषमुक्त करार देते हुए 22 साल पुराने इस चर्चित हत्याकांड से मुक्त कर दिया।