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पानीपत में दोहरे हत्याकांड का आरोपी बरी: 22 साल बाद हाईकोर्ट ने पलटा निचली अदालत का फैसला, दिया संदेह का लाभ

Tue, 15 Apr 2025 08:19 AM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

पानीपत के गांव चंदौली में 2003 में बाबा शिवनाथ और उनके शिष्य माया राम की हत्या कर दी गई थी। एक किसान ने डेरे में दोनों के शव देखे थे। दोनों के चेहरे तेजाब से झुलसे हुए थे।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पानीपत में वर्ष 2003 में हुए दोहरे हत्याकांड के 22 साल बाद पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने आरोपी राजीव नाथ को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ पर्याप्त और ठोस साक्ष्य पेश करने में असफल रहा।
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पानीपत के गांव चंदौली में मौजूद धार्मिक डेरे में दो साधुओं बाबा शिवनाथ और उनके शिष्य माया राम की नृशंस हत्या कर दी गई थी। सात जनवरी 2003 को खेतों की ओर जा रहे किसान पृथ्वी सिंह ने डेरे में दोनों को मृत अवस्था में पाया। उनके चेहरे तेजाब से झुलसे हुए थे। लगभग एक महीने तक पुलिस के हाथ कोई ठोस सुराग नहीं लगा। फिर छह फरवरी 2003 को गांव के सरपंच रूप चंद और एक अन्य व्यक्ति सुखबीर सिंह ने दावा किया कि आरोपी राजीव नाथ ने उनके सामने हत्या की बात स्वीकार की थी।
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निचली कोर्ट ने दी थी आजीवन कारावास की सजा

उन्होंने बताया कि राजीव गद्दी का वारिस बनना चाहता था, जबकि बाबा शिवनाथ उसे अपने शिष्य माया राम को सौंपना चाहते थे। इसी रंजिश में राजीव ने हत्या की। पुलिस ने इस कथित अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति को आधार बनाते हुए राजीव नाथ को गिरफ्तार किया। 



2004 में निचली अदालत ने राजीव को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। राजीव ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसके चलते उसे 2009 में जमानत मिल गई। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए कहा कि पूरा मामला एक अतिरिक्त न्यायिक कबूलनामे पर आधारित था, जो कानूनी दृष्टि से कमजोर साक्ष्य है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि आरोपी वास्तव में दोषी था, तो वह एक महीने बाद खुद सरपंच के पास जाकर हत्या की बात क्यों स्वीकार करता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न तो कोई प्रत्यक्षदर्शी था, न ही राजीव नाथ को मृतकों के साथ आखिरी बार देखे जाने का कोई प्रमाण मिला। 

पुलिस ने आरोपी से कोई हथियार या तेजाब भी बरामद नहीं किया। फिंगरप्रिंट रिपोर्ट भी किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई। कोर्ट ने कहा कि जब कोई मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित हो, तो उन साक्ष्यों की श्रृंखला इतनी मजबूत होनी चाहिए कि कोई अन्य निष्कर्ष संभव ना हो। लेकिन इस मामले में साक्ष्य अधूरे थे, और ऐसे में संदेह का लाभ आरोपित को दिया जाना न्यायसंगत है। हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष राजीव नाथ के खिलाफ आरोप साबित करने में असफल रहा और उसे दोषमुक्त करार देते हुए 22 साल पुराने इस चर्चित हत्याकांड से मुक्त कर दिया।
 
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