- 21 साल की उम्र के बाद सुधारात्मक आकलन नहीं कराया, हाईकोर्ट सख्त
- जुवेनाइल जस्टिस कानून की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं होने को माना अहम आधार
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और पॉक्सो मामले में दोषी ठहराए गए रोहतक निवासी ऐसे व्यक्ति की सजा पर रोक लगा दी है, जो अपराध के समय कानून से संघर्षरत बालक था। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि 21 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद किशोर न्याय कानून के तहत अनिवार्य सुधारात्मक आकलन की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई है तो यह अपील लंबित रहने के दौरान सजा निलंबित करने के लिए महत्वपूर्ण परिस्थिति हो सकती है।
जस्टिस मंदीप सिंह पन्नू की पीठ ने कहा कि कानून का उद्देश्य केवल बाल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि उसके सुधार और पुनर्वास की संभावना को भी ध्यान में रखना है। अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि संबंधित व्यक्ति के मामले में 21 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद कानून में निर्धारित सुधारात्मक आकलन की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने इसे महज तकनीकी कमी नहीं माना, बल्कि अपील पर विचार के दौरान प्रासंगिक परिस्थिति माना।
हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में किशोर न्याय कानून के तहत अपनाई जाने वाली प्रक्रिया का अनुपालन न होना सजा के निलंबन के आवेदन पर विचार करते समय ध्यान में रखा जा सकता है। इसी आधार पर अदालत ने दोषी की सजा को उसकी अपील लंबित रहने तक निलंबित कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कानून से संघर्षरत बालक के मामले में संबंधित प्राधिकरणों को किशोर न्याय अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करना होगा। खासतौर पर 21 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद सुधारात्मक आकलन की प्रक्रिया का अपना महत्व है। अदालत ने इसी प्रक्रिया के पालन न होने को वर्तमान चरण में आरोपी के पक्ष में सजा निलंबित करने के लिए महत्वपूर्ण आधार माना। मामला अब मुख्य अपील की सुनवाई के दौरान आगे विचाराधीन रहेगा।