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हरियाणा दिवस पर विशेष: आकार नहीं, आकांक्षाएं मायने रखती हैं... अधूरी रह जाएगी ये टैगलाइन

Sat, 01 Nov 2025 09:41 AM IST
शाहरुख खान विजय गुप्ता, संपादक, हरियाणा

सार

हरियाणा दिवस पर विशेष: भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, प्रदूषण, नशा...यह सब दूर किए बिना हरियाणा बदल रहा है कि टैगलाइन अधूरी रह जाएगी। पड़ोसी राज्यों के साथ पानी को लेकर वर्षों से चला आ रहा विवाद हो या अपनी राजधानी व विधानसभा का संघर्ष... इसके लिए नीतियों के साथ नीयत व इच्छाशक्ति भी जरूरी है।
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haryana diwas - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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करीब एक माह पहले आईपीएस वाई पूरण कुमार और उसके बाद एएसआई संदीप लाठर की आत्महत्या के मामलों के बाद भी इस बार हरियाणा के माहौल में जातीय जहर नहीं घुला। पूरण कुमार ने सुसाइड नोट में जाति आधारित उत्पीड़न और भेदभाव के आरोप लगाए थे जिसे तूल मिलने लगा था। 
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उसी बीच संदीप लाठर के सुसाइड नोट ने इसे जातीय नहीं बल्कि भ्रष्टाचार के मामले का रूप दे दिया। कुछ लोग और संगठन जो पूरण कुमार की आत्महत्या को जाति आधारित मुद्दा बना रहे थे वह एकाएक शांत हो गए। उधर, संदीप लाठर के परिजनों ने भी सूझबूझ का परिचय देते हुए इसे जातीय मुद्दा नहीं बनने दिया। 2010 और 2016 में जातीय हिंसा की जलन झेल चुका हरियाणा इस बार उस आग से बच गया। 

फतेहाबाद के चांदपुरा गांव के लोग इसलिए प्रदर्शन पर उतर आए क्योंकि वह गांव में मिले कन्या भ्रूण के लिए न्याय चाहते हैं। कोख में ही कन्या की किलकारियां खत्म कर देने वालों को सजा दिलाना चाहते हैं। बेटों के मुकाबले बेटियों की कम संख्या का दंश झेल रहा हरियाणा अब सामाजिक परिवर्तन की राह पर है।  
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... यह बदलते हरियाणा का, आज के हरियाणा का मिजाज है। जहां चुनाव से लेकर नौकरियों तक में जाति का नारा उछलता रहा है वहां के लोग आज ऐसे मामलों को बेवजह तूल नहीं देना चाहते। जहां बेटियों को बेटों से इतना श्रेष्ठ माना जाता था कि लिंगानुपात चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया वहां से देशभर में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा गूंजा। 

उस नारे को चरितार्थ करते हुए आज यहां की बेटियां खेल के मैदान से लेकर अंतरिक्ष तक अपनी मेधा व मेहनत का लोहा मनवा रही हैं, नेतृत्व की नई परिभाषा लिख रही हैं। भगवान ब्रह्मा के अवतरण, आर्यों के निवास स्थान और वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार की इस धरा को 59 साल पहले भौगोलिक, भाषाई व राजनीतिक आधार पर अलग राज्य का दर्जा मिला था। 

 

हरियाणवी बोलचाल, लोक-संस्कृति और जीवनशैली पंजाब से अलग थी...और इसी ने अलग राज्य की नींव रखी। लेकिन था क्या अपने पास? संसाधन सीमित थे लेकिन जज्बा अपार। पहले मुख्यमंत्री पंडित भगवत दयाल शर्मा ने कहा था...हम छोटे राज्य हैं पर हौसले बड़े हैं। 
 

उसी आत्मविश्वास ने हरियाणा को सामाजिक रूढ़ियों से आगे निकाल विकास के पथ पर बढ़ाया। तकनीक, नवाचार और परिश्रम के मेल से हरियाणावी आज हर क्षेत्र में विश्व में परचम लहराना चाहते हैं। जिस मिट्टी ने अन्न उगाया वही मिट्टी खिलाड़ियों, सैनिकों, वैज्ञानिकों और उद्योगपतियों को जन्म देती रही है। 

हरित क्रांति लाने वाला यह प्रदेश आज केंद्रीय खाद्यान्न भंडार में अन्न का योगदान देने में दूसरे स्थान पर है। सेना में सात फीसदी जवान आज हरियाणा से हैं तो प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश में तीसरे पायदान पर है, महिला शिक्षा दर और लैंगिक अनुपात दोनों सुधरे हैं। 

अगर कोई राज्य अपनी जनसंख्या के अनुपात में देश को सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी देता है, एशियाड से लेकर ओलंपिक तक सबसे ज्यादा मेडल देश की झोली में डालता है...तो वह है हरियाणा। 1980 के दशक के बाद भारत में औद्योगिकीकरण के विस्तार के साथ इस राज्य ने ऑटोमोबाइल इतिहास में नया अध्याय लिखा है। आईटी और सर्विस सेक्टर ने राज्य की दिशा बदल दी। 
 

हरियाणा की 59 वर्ष की यह यात्रा केवल सांख्यिक उपलब्धियों की नहीं, बल्कि मानवीय आत्मबल की कहानी है। यह आंकड़े साबित करते हैं कि आकार नहीं, आकांक्षाएं मायने रखती हैं। आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए जहां हर हरियाणवी का पुरुषार्थ मायने रखता है वहीं शासन-सत्ता का सोच भी। 
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डिजिटल युग में सरकार सुविधाओं को सहज उपलब्ध करवाने की ओर अग्रसर है तो भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, प्रदूषण, नशा...यह सब दूर किए बिना हरियाणा बदल रहा है कि टैगलाइन अधूरी रह जाएगी। पड़ोसी राज्यों के साथ पानी को लेकर वर्षों से चला आ रहा विवाद हो या अपनी राजधानी व विधानसभा का संघर्ष... इसके लिए नीतियों के साथ नीयत व इच्छाशक्ति भी जरूरी है।
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