फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Haryana: कस्टडी यातना पर मानवाधिकार आयोग सख्त, आईजीपी स्तर की जांच के आदेश

Thu, 23 Jul 2026 03:44 PM IST
Nivedita न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

अभियुक्त ने आरोप लगाया था कि पुलिस रिमांड के दौरान उसे सीआईए परिसर में ले जाकर चार पर्चियों में से एक चुनने के लिए मजबूर किया गया। फ्रैक्चर लिखी पर्ची निकलने के बाद उसकी आंखों पर पट्टी बांधकर दो ईंटों के बीच पैर रखकर किसी भारी वस्तु से वार कर उसकी टांग तोड़ दी गई।
विज्ञापन
हरियाणा मानवाधिकार आयोग - फोटो : फाइल
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने गुरुग्राम के सोहना में पुलिस अभिरक्षा के दौरान एक अभियुक्त के साथ क्रूर मारपीट, पैर तोड़ने, धमकी देने और घटना का झूठा घटनाक्रम तैयार करने के गंभीर आरोपों पर स्वतः संज्ञान लिया है। 
विज्ञापन


आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति ( सेवानिवृत) ललित बत्रा ने स्पष्ट कहा कि पुलिस अभिरक्षा पूछताछ का माध्यम हो सकती है, लेकिन किसी भी स्थिति में यातना का लाइसेंस नहीं। आयोग ने पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिए हैं कि मामले की जांच आईजीपी से कम रैंक के अधिकारी से न कराई जाए और विस्तृत रिपोर्ट आयोग के समक्ष पेश की जाए।

आयोग ने यह कार्रवाई सोहना के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के 30 जून 2026 के आदेश के आधार पर की है। न्यायिक आदेश में अभियुक्त ने आरोप लगाया था कि पुलिस रिमांड के दौरान उसे सीआईए परिसर में ले जाकर चार पर्चियों में से एक चुनने के लिए मजबूर किया गया। फ्रैक्चर लिखी पर्ची निकलने के बाद उसकी आंखों पर पट्टी बांधकर दो ईंटों के बीच पैर रखकर किसी भारी वस्तु से वार कर उसकी टांग तोड़ दी गई। बाद में उसे डॉक्टरों के सामने यह कहने के लिए दबाव बनाया गया कि चोट फ्लाईओवर से गिरने के कारण लगी है।
विज्ञापन


आयोग ने मामले को मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत सुनवाई योग्य मानते हुए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट, एमएलआर, एक्स-रे, सीटी स्कैन, डिस्चार्ज समरी, पुलिस स्टेशन व लॉकअप की सीसीटीवी फुटेज, डीवीआर, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, लोकेशन डेटा और अन्य सभी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सुरक्षित रखने व प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं। 

साथ ही अभियुक्त की अभिरक्षा, पूछताछ और बरामदगी से जुड़े सभी पुलिस अधिकारियों का विवरण तथा उनके विरुद्ध किसी विभागीय या आपराधिक कार्रवाई की स्थिति भी मांगी गई है।

आयोग ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 20(3), 21 और 22 के तहत प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और शारीरिक सुरक्षा संरक्षित है। सर्वोच्च न्यायालय के डीके बसु, नीलाबती बेहरा, जोगिंदर कुमार और परमवीर सिंह सैनी मामलों का उल्लेख करते हुए आयोग ने कहा कि पुलिस हिरासत में हिंसा कानून के शासन पर गंभीर आघात है। मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर 2026 को होगी और उससे एक सप्ताह पहले सभी संबंधित अधिकारियों को अपनी विस्तृत रिपोर्ट आयोग में दाखिल करनी होगी।
विज्ञापन

 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें