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विश्व गौरेया दिवस : पहले हर घर में चहकती थी, अब हो गई गुम

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एक समय था जब नन्हीं गौरैया घर के आंगन में चहकती फुदकती दिख जाती थी गलियों में जगह-जगह गौरैया के घोंसले दिखाई देते थे। लेकिन अब इसकी आवाज हमारे कानों तक नहीं पहुंचती। दिनोंदिन गौरैया की संख्या में कमी आती जा रही है। गौरैया दिवस का उद्देश्य इस पक्षी का संरक्षण करना है। लुप्त होती गौरैया को बचाने के लिए सेव स्पैरो फाउंडेशन ने बीड़ा उठाया है। फाउंडेशन ने गौरैया को बचाने के लिए एक वर्कशाप बनाई है जहां घोंसले बनाए जा रहे है। घोंसलों में केमिकल फ्री पेंट का प्रयोग किया जाता है। यह घोंसले बिना लाभ के सिर्फ लागत पर ही लोगों को मुहैया कराए जाते है। प्रदेश के विभिन्न जिलों में ही नहीं बल्कि मुंबई सहित अन्य शहर तक भेजे जाते हैं। अब तक 40 हजार घोंसले लोगों को मुहैया करवाए जा चुके हैं। एक घोंसले पर 145 से 150 रुपये तक लागत आती है। इतना ही नहीं 2000 के करीब संस्था स्वयं भी मंदिर व अन्य सार्वजनिक स्थानों पर लगा रखे हैं। संस्था ने फेसबुक पेज भी बनाया है जिसमें हजारों लोग जुड़े है। करीब 250 से अधिक संस्थाएं भी फाउंडेशन से जुड़ी है। पिछले चार साल से संस्था चिड़िया बचाने के लिए प्रयासरत है।
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मकानों का बदलता स्वरूप खो रहा चिड़िया
पहले और अब मकानों के डिजाइन में बहुत ज्यादा बदलाव आया है। विशेषज्ञ मानते है कि पहले खुले मकान होते थे जहां चिड़िया आती जाती रहती थी और घोंसले तक बनाती थी मगर अब नए डिजाइन के बन रहे घरों को बिल्कुल बंद बनाया जाता है। शीशों से पूरी तरह बंद मकान बन रहे है। जिस कारण चिड़िया को घोंसला बनाने की जगह नहीं मिलती है।
मेरी गली में गुम हो गई तो लिया चिड़िया बचाने का संकल्प
मेरी गली में पहले हम बहुत चिड़िया देखते थे मगर बाद में हमने महसूस किया कि चिड़िया गुम हो गई। जिसके बाद निर्णय लिया कि अब चिड़िया बचाने के लिए काम करेंगे। इसी कड़ी में सेव स्पैरो फाउंडेशन का गठन किया। मैं स्वयं एक कलाकार हूं और पेंटिंग में स्टेट चैंपियन रहा हूं। पहले स्वयं ही घोंसले बनाने शुरू किए थे। फिर वर्कशाप बनाई। अब वर्कशाप में बिना लाभ के घोंसले बनाकर दिए जाते है। स्वयं के घर में भी करीब 15 घोंसले लगा रखें है। हमारा उद्देश्य यहीं है कि ज्यादा से ज्यादा चिड़िया को बचाया जा सके। - राहुल बंसल, डायरेक्टर सेव स्पैरो फाउंडेशन।
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2010 में हुई वर्ल्ड गौरैया दिवस की हुई शुरूआत
दा वर्ल्ड गौरैया दिवस कि शुरुआत 2010 में नेचर फार एवर सोसाइटी ऑफ इंडिया ने राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर की थी। इसका मुख्य उद्देश्य गौरैया को लेकर लोगों को जागरूक करना था। गौरैया की घटती संख्या को लेकर राष्ट्र स्तर पर काफी प्रयास किए गए है। जिससे की गौरैया की घटती जनसंख्या के कारणों का पता लगाया जा सके और उसके बचाव के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सके। शहरों में आसानी से दिखने वारी गौरैया की संख्या में पिछले दशक में काफी कमी आई है।
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