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पीजीआई से मंगवा दो हमारी कोबॉल्ट मशीन

Sun, 27 Dec 2015 01:07 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला भिवानी
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भिवानी। कैंसर से जूझ रहे मरीजों की कीमोथैरेपी व रेडियोथैरेपी वास्ते एक दशक पहले अत्याधुनिक कोबॉल्ट मशीन जिला अस्पताल में आई थी, लेकिन कुछ ऐसी वजह बनी कि यह मशीन यहां से रोहतक पीजीआई चली गई। कोबॉल्ट मशीन की इस इलाके को कितनी जरूरत है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हर हफ्ते-दस दिन में यहां से चार सौ के लगभग मरीज कीमोथैरेपी व रेडियोथैरेपी के लिए रोहतक-दिल्ली व जयपुर की ओर रुख करते हैं। 265 मरीज तो ऐसे हैं, जिन्हें हर 10 वे दिन रोडवेज की बस में सवा सौ किलोमीटर तक सफर करना पड़ता है।
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इस गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों की परेशानी यहीं खत्म नहीं हो जाती है। पीजीआई रोहतक व एम्स अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। लंबे सफर के बाद इन मरीजों को अस्पताल में लंबी लाइन में खड़े होने से लेकर कई परेशानियों से दो-चार होना पड़ता है। कैंसर से जूझ रहे मरीजों व परिजनों यही दुआ कर रहे हैं कि काश, कोबॉल्ट मशीन भिवानी आ जाए। स्टाफ व इंफ्रास्ट्रक्चर के अभाव में कोबॉल्ट मशीन रोहतक पीजीआई भेजी गई थी। अब यदि स्टाफ और इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध हो जाए तो कीमोथैरेपी व रेडियोथैरेपी यहां भी आरंभ हो सकती है।
तीन साल के प्रयास से आई मशीन और कर दी पीजीआई शिफ्ट
सामान्य अस्पताल में कैंसर यूनिट बनाने की योजना पर काम वर्ष 2008 में शुरू हुआ।  करीब तीन साल के प्रयासों के बाद वर्ष 2011 में सामान्य अस्पाल के लिए  कैंसर की कोबाल्ट मशीन लाई गई। मगर उस समय इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं होने  की बात कहते हुए मशीन को पीजीआई रोहतक शिफ्ट किया गया। उसके बाद से आज तक  उस मशीन के वापस आने का इंतजार है।
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रोडवेज, पास के रूप में बना सहारा
बेशक स्वास्थ्य विभाग की अव्यवस्थाओं के चलते मरीजों को 60 से 130 किलोमीटर तक  के चक्कर लगाने पड़ रहे हो। मगर यहां रोडवेज इनका सहारा बना है। कैंसर  मरीजों के बस पास बनाए जा रहे है। रोडवेज की ओर से कैंसर मरीजों के  कीमोथैरेपी के लिए 150 किलोमीटर तक की दूरी के पास बनाए जाते है। फिलहाल 265  मरीजों के पास बनाए गए है। एक इनके साथ केयर टेकर के रूप में जा सकता है। पास कीमोथैरेपी की तिथि के दिन ही मान्य है।
क्या है कीमोथैरेपी
कैंसर  का पता लगने के बाद बायोप्सी की जाती है। ऑपरेशन कर कैंसर वाले हिस्से या गांठ को निकालना ही बायोप्सी है। कैंसर का पता लगने के बाद उसके इलाज में कीमोथैरेपी अहम है। यह कैंसर के प्रभाव को कम करने के लिए दी जाती है। हरेक तरह के कैंसर मरीज को कीमोथैरेपी नहीं दी जा सकती। कुछ केसों में रेडियोथैरेपी दी जाती है। ताकि शरीर में कैंसर के उत्तकों को कम किया जा सके।
थैलीसिमिया के मरीज भी लगा रहे रोहतक-दिल्ली के चक्कर
जिले  में थैलीसिमिया के मरीजों की भी संख्या काफी है। जिन्हें हर महीने रक्त बदलवाने के लिए पीजीआई रोहतक व दिल्ली के चक्कर लगाने पड़ते है। जबकि यह सुविधा जिला अस्पताल में भी शुरू हो सकती है।
यहां तो नाक-कान दिखाने के लिए भी पीजीआई जाओ
सामान्य अस्पताल के हालात ऐसे है कि यहां अगर नाक, कान, गले, स्किन संबंधित कोई  समस्या है तो उसके लिए भी पीजीआई रेफर किया जाता है। सामान्य अस्पताल में  ईएनटी, स्कीन स्पेशलिस्ट नहीं है। ऐसे में सामान्य मरीज तो प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करा रहे है मगर एक्सीडेंट और झगड़े के केसों में पीजीआई  जाना मरीजों की मजबूरी है।
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वर्जन::::
ये दोनों थेरेपी आज के समय की जरूरत है। जिस समय इन मशीनों को रोहतक भेजा गया, वे इस अस्पताल में नियुक्त नहीं थे। वैसे अब यहां मेडिकल कॉलेज बनने जा रहा है, तो संभावना है कि भविष्य में ये सुविधाएं भी शहर में ही उपलब्ध होंगी और मरीजों को इन गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए कहीं अन्य जगह नहीं जाना पड़ेगा।
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डा. हेमंत
कार्यकारी प्रधान चिकित्सा अधिकारी
सामान्य अस्पताल, भिवानी

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