फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Bhiwani News: बिना मानक सड़क पर दौड़ रही स्कूल की लॉरी, ताक पर नियमों से खतरे में सवारी

Thu, 11 Apr 2024 11:58 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
विज्ञापन
ढिगावामंडी क्षेत्र में छुट्टी के बाद बच्चों को घर छोड़ने जाती स्कूल बस। 
विज्ञापन
भिवानी। बिना मानक पूरे किए ही स्कूलों की लॉरी बच्चों की जान पर भारी पड़ रही है। वाहन पासिंग के दौरान ही स्कूली वाहनों के मानक जांचे जाते हैं, इसके बाद सड़क पर दौड़ रहे स्कूली वाहनों की कोई जांच नहीं हो रही है। कनीना के उन्हानी गांव के पास स्कूल बस हादसे ने एक बार फिर स्कूली वाहनों में बच्चों के सुरक्षित सफर की पोल खोल दी है। हादसे के बाद ही शिक्षा विभाग और आरटीए जागता है।
विज्ञापन

भिवानी में भी 411 निजी स्कूल हैं, जिनमें एक स्कूल के पास 25 से 30 स्कूली वाहन हैं। मगर अधिकांश स्कूलों के बच्चों का घर से स्कूल तक का सफर खतरों से भरा है, क्योंकि ये ऑटो रिक्शा या फिर ई-रिक्शा में जाते हैं, जिनमें स्कूल भी बच्चों की सुरक्षा की कोई जिम्मेदारी नहीं लेता। वहीं हादसा होने पर बच्चों की जानमाल के नुकसान का डर भी सबसे अधिक बना रहता है।
अब भिवानी जिले में शिक्षा विभाग क्लस्टर स्तर पर क्लस्टर मुखिया की कमेटी के माध्यम से निजी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के मानकों की जांच कराएगा। इसकी रिपोर्ट भी मुख्यालय पर जिला शिक्षा अधिकारी को सौंपी जाएगी।
विज्ञापन

हरियाणा में 2017 में फरीदाबाद में हुए हादसे के बाद बच्चों की निजी स्कूलों में सुरक्षा और वाहनों में सुरक्षित सफर को लेकर मापदंड तय किए गए। इनमें स्कूली वाहनों के लिए करीब 32 मानक तय हुए हैं, जिनके पूरा करने पर ही स्कूली वाहन को पासिंग में फिटनेस सर्टिफिकेट मिलेगा। मगर पासिंग के दौरान जो मानक पूरे दर्शाये जाते हैं, सड़क पर दौड़ते समय ये मानक पूरे हैं या नहीं शायद इसकी जांच नहीं हो रही है। अगर ऐसा होता तो शायद समय रहते बच्चों की जान बचाई जा सकती है। अधिकांश स्कूलों के स्कूली वाहनों की भी ठीक से पहचान नहीं हो पा रही है, क्योंकि न तो इनका रंग पीला है न इन वाहनों पर स्कूल का नाम होता है।
ये वाहन दिन में कमर्शियल इस्तेमाल होते हैं, सुबह और दोपहर को स्कूली बच्चों को घर से स्कूल और स्कूल से घर ले जाने में प्रयोग हो रहे हैं। जिले में 411 मान्यता प्राप्त स्कूल हैं, प्रत्येक स्कूल के पास स्कूली वाहनों की भी लंबी फेहरिस्त है। कब कौन सा वाहन फिटनेस मानक पर खरा उतरेगा ये शायद शिक्षा विभाग ने भी कभी जानना जरूरी नहीं समझा है। वाहनों की फिटनेस जांच के लिए जिला स्तर पर अधिकारियों की एक कमेटी भी बनी है, इस कमेटी में शिक्षा विभाग के अधिकारी और आरटीए कार्यालय के कर्मचारी भी शामिल हैं। साल भर में कितने स्कूली वाहन जांचे, इसका रिकॉर्ड तक शिक्षा विभाग के पास नहीं है। संवाद

ये मानक हैं स्कूली वाहन में जरूरी
- स्पीड गवर्नर लगाना, 30 किमी प्रति घंटा स्पीड पर वाहन चलाना और जीपीएस सिस्टम लगाना अनिवार्य है।
- स्कूली वाहन के शीशों पर काली फिल्म का इस्तेमाल नहीं होगा, बस के शीशों पर लोहे की ग्रिल लगाई जाएगी।
- चालक के पास पांच साल हैवी वाहन चलाने का अनुभव, उस पर कोई आपराधिक केस दर्ज नहीं होना चाहिए।
- स्कूली वाहन का रंग पीला होना चाहिए, आगे और पीछे स्कूल का नाम, ईमेल पता व फोन नंबर के अलावा इमरजेंसी नंबर भी अंकित होने चाहिए।
- स्कूल वाहन में सीसीटीवी कैमरा, फायर सिलिंडर, फस्ट एड बॉक्स अनिवार्य हैं। आपातकालीन खिड़की भी होनी चाहिए।
- स्कूली वाहन चालक का हर छह माह में मेडिकल फिटनेस जांच जरूरी है।
- स्कूली वाहन में महिला अटेंडेंट अनिवार्य है।
- स्कूली वाहन की हर दो साल में पासिंग कराकर फिटनेस सर्टिफिकेट अनिवार्य है।

अभिभावकों का ये तर्क
अभिभावक दिनेश, कर्ण सिंह, दयाकिशन का कहना है कि स्कूली वाहन सुविधा के नाम पर निजी स्कूल मनमाना चार्ज वसूलते हैं। अगर मना करते हैं तो बच्चों को प्राइवेट वाहनों में स्कूल भेजने की बात कह देते हैं। अभिभावक भी अपना बजट के हिसाब से बच्चे को छोटे वाहनों में भेजते हैं तो स्कूल कोई जिम्मेदारी भी नहीं लेता है। स्कूल वाहनों के लिए भी नियम तय हैं तो उनमें वसूला जाने वाला चार्ज भी तय होना चाहिए।
ट्रैफिक पुलिस जागरुकता तक सिमटी
स्कूलों में जाकर ट्रैफिक पुलिस जागरुकता तक ही सिमटी है, सड़क पर दौड़ रहे स्कूली वाहनों पर ज्यादा शिकंजा नहीं कसा गया है, इसकी एक वजह यह भी है कि स्कूली वाहन सीधे तौर पर आरटीए यानी क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। वहीं ऑटो रिक्शा या ई-रिक्शा में ज्यादा बच्चे बैठाने पर यातायात पुलिस जरूर चालान कर रहे हैं।
निजी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और स्कूली वाहनों के लिए मानक तय किए हुए हैं। जिला स्तर पर पहले से ही कमेटी बनी है, जिसमें शिक्षा अधिकारी भी सदस्य हैं। लेकिन अब क्लस्टर स्तर पर क्लस्टर मुखिया की एक अलग से कमेटी बनाई जाएगी, जो इलाके के निजी स्कूलों के अंदर बच्चों की सुरक्षा और सुरक्षित वाहनों के मानकों की जांच कर इसकी रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय को मुहैया कराएगी।
विज्ञापन

- नरेश महता, जिला शिक्षा अधिकारी, भिवानी।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें