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कानून में बदलाव के साथ सख्ती से हो पालन

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50 फोटो पंडित सीताराम बीएड कॉलेज में अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए छात्राएं व शि? - फोटो : Bhiwani
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आखिर कब तक देश की बेटियां दरिंदगी का शिकार होकर खुद की जान गंवाती रहेंगी। ये सिलसिला आखिर कब थमेगा। ये सवाल आज हर उस बेटी की जुबां पर है जो घर से बाहर निकलते समय यह सोचती है कि आखिर वह सुरक्षित घर लौटेंगी या नहीं। देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है, कानून है और हर किसी को घूमने फिरने, बात रखने और फिर निजता की आजादी है, फिर भी बेटियां, महिलाएं असुरक्षित नहीं। यह कहना है महम रोड स्थित पंडित सीताराम शास्त्री शिक्षण महाविद्यालय की शिक्षक व छात्राओं का। वे अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में हैदराबाद में दरिंदों द्वारा महिला डॉक्टर की सामूहिक दुष्कर्म के बाद की गई हत्या पर खुलकर अपने विचार रखे।
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बीएड कॉलेज की प्राध्यापिका रेखा, करिश्मा, रुचि व छात्रा रितु, मोनिका, अनुराधा, मीनू, नीलम, नीशा यादव, लतिका, मीनाक्षी, प्रीति ने कहा कि बेटियों की सुरक्षा और अस्मिता को सुरक्षित रखने के लिए कानून में जरूरी बदलाव के साथ-साथ सख्ती से पालन कराने की भी मांग रखी और आपराधिक मानसिकता वाले लोगों को फांसी पर चढ़ाने की पैरवी की।
देश की कानून व्यवस्था ही लचीली बना दी गई है। जब तक सामूहिक दुष्कर्म और निर्मम हत्यारों को फांसी की सजा नहीं मिलेगी। तब तक देश मेें इस तरह का सुधार नहीं आएगा। कानून में आरोपी को सजा नहीं मिल रही है। इसी का नतीजा है कि एक के बाद एक बेटी इस तरह के भेड़ियों का शिकार हो रही है। देश का गुस्सा आज भले ही उबाल पर है, मगर सख्त कानून न होने से आरोपियों को फांसी नहीं मिलना व्यवस्था पर ही बड़ा सवाल है।
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- गुंजन, छात्रा
कई मुस्लिम देशों में चोरी जैसे छोटे अपराध के लिए भी मौत की सजा सुना दी जाती है। जबकि देश में सामूहिक दुष्कर्म और जघन्य तरीके से हत्या जैसे अपराध में फांसी का तो प्रावधान है, मगर फांसी नहीं दी जाती। ऐसा न होने से बीमार मानसिकता और अपराधियों में कानून का डर नहीं रहता है। वे एक के बाद एक अपराध करते चलते जाते हैं। कानून में केवल मुकदमा और फिर जेल जाने और फिर बाहर आने का खेल ही चलता रहता है। इससे न केवल देश की कानून व्यवस्था से लोगों का भरोसा उठ रहा है, बल्कि ऐसे अपराधों से आक्रोश भी बढ़ रहा है। वो दिन दूर नहीं जब लोग कानून को हाथ में लेने से नहीं डरेंगे और खुद ही जज बन सजा सुनाने लग जाएंगे।
- ममता, छात्रा
कोई भी महिला अपराध होता है, उसमें सिर्फ महिलाओं पर ही दोषारोपण होता है, जबकि लड़कों पर इस तरह की कोई बंदिश या जागरूकता लाने के लिए कोई मुहिम नहीं चलती। सुरक्षा को लेकर महिलाओं के साथ साथ पुरुषों में भी जागरूकता लाना बहुत जरूरी है। यौन उत्पीड़न और फिर हत्या जैसे गंभीर अपराध में कानून का सख्त होना जरूरी है। कहने को तो लड़का और लड़की समान हैं, मगर जब तक लोगों की मानसिकता समान नहीं होगी, समाज में इस तरह का बदलाव नहीं आ सकता।
- भारती, छात्रा।
बेटियों के लिए समाज में आज बराबरी का दर्जा तो सिर्फ कहने के लिए है, वे अपना वजूद बनाने में काफी कुछ चुनौतियों का सामना कर अपने ही हक के लिए लड़ रही हैं। मगर महिलाओं के साथ इस तरह के घिनौने अपराध उनकी सुरक्षा और अस्मिता पर आई आंच कानून व्यवस्था पर ही बदनुमा दाग है। तब तक महिलाएं पूरी तरह से सुरक्षित नहीं होगी, सभ्य समाज की नींव और विकास परक सोच बेकार है। क्योंकि महिलाओं का घर, परिवार, समाज और देश में बहुत बड़ा योगदान है।
-रेखा, महिला प्राध्यापक।
महिला सुरक्षा का मुद्दा आज हर किसी के लिए चिंतनीय बन चुका है। देश 21वीं सदी में विश्व गुरु बनने की तैयारी कर रहा है, मगर मानवीय पहलु और मानवता की सोच लगातार गिरती जा रही है। नैतिक मूल्यों का इस तरह हनन सभी के लिए चिंता का विषय है। समाज में बीमार मानसिकता के लोग खुलेआम घूम रहे हैं, जो समाज, देश और मानवता के लिए भी किसी आतंकवाद के खतरे से कम नहीं है। घिनौना और जघन्य अपराध करने के लिए सिर्फ फांसी की सजा ही मुकर्रर की जाए, ताकि कानून का भय लोगों के जहन में अपराध करने की सोच के वक्त उन पर हावी रहे।
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- करिश्मा, महिला प्राध्यापक।
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