फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सजा-ए-मौत ही काफी नहीं, ऐसे दरिंदों को उसी दर्द और तकलीफ से गुजारें

विज्ञापन
51 फोटो भिवानी के वैश्य कॉलेज के सेल्फ फाइनेंस डिपार्टमेंट में अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में प? - फोटो : Bhiwani
विज्ञापन
सामूहिक दुष्कर्म और निर्मम हत्या बीमार मानसिकता का ही कृत्य हो सकता है। जब तक ऐसी दरिंदों को उस दर्द और तकलीफ से नहीं गुजारा जाएगा तब तक ऐसा करने वालों को नसीहत नहीं मिलेगी। अगर कानून ऐसा नहीं करेगा तो फिर ऐसे आरोपियों को खुली भीड़ के हवाले किया जाए, ताकि वो ऐसे दरिंदों को खुद मौत के घाट उतार दें। हमारी कानून व्यवस्था इसकी इजाजत तो नहीं देगी, लेकिन इस तरह की घृणित मानसिकता को सबक सिखाने के लिए इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं बचा है। यह कहना है वैश्य महाविद्यालय के कंप्यूटर साइंस एंड मैनेजमेंट डिपार्टमेंट की प्राध्यापिकाओं का। वे अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में खुलकर अपने विचार रखे और बेटियों की सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाने की मांग की।
विज्ञापन

डिपार्टमेंट की डॉयरेक्टर डॉ. प्रोमिला सुहाग नेे प्राध्यापिका डॉ मोनिका मित्तल, रिंकू पंघाल, नंदनी, मोनिका, मनीषा अहलावत, अंजली व सुमन के साथ सामूहिक चर्चा में कहा कि देश के नागरिकों का गुस्सा आज निर्भया के बाद महिला पशु चिकित्सक की निर्मम हत्या से उबाल पर है। पूरा देश पीड़िता की न्याय की मांग को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन कर रहा है। लेकिन इसके बावजूद भी इस तरह के मामलों में कोई कमी नहीं आ रही है। इसकी एक ही वजह है कि आज भी कानून में कहीं न कहीं अपराधियों व दरिंदों के लिए रहम की गुंजाइश बची है, जिसका फायदा उठाकर वे न केवल खुद को बचाने का प्रयास करते हैं, बल्कि नारी की अस्मत पर भी प्रश्न चिह्न लगा रहे हैं। भय बिना प्रीत नहीं होती, यह कहावत समाज के साथ कानून पर भी सटीक है। जब तक कानून का डर हमारी मानसिकता पर नहीं होगा, तब तक सही रास्ता अख्तियार करना मुश्किल है। महिलाओं को समाज में सुरक्षित रखना है तो कानून को सख्त होना ही पड़ेगा, और ऐसे दरिंदों को सिर्फ और सिर्फ सजा ए मौत देनी होगी।
देश में निर्भया का मामला जब भी सामने आया पूरे देश को मीडिया ने ही एकजुट किया। मीडिया इस तरह के मामलों में न केवल देश के लोगों को एकजुट करती रही है, बल्कि पीड़ितों की लड़ाई को निर्णायक मोड़ तक भी पहुंचा चुकी है। अब इस मामले में भी मीडिया अपने चौथे स्तंभ होने का दायित्व इस तरह निभाए कि देश की न्याय व्यवस्था ऐसे दरिंदों को सजा ए मौत देने पर बाध्य हो जाए। कानून में आरोपियों पर मुकदमा चलाना और उन्हें जेल भेजना ही पीड़िता के लिए न्याय नहीं है, बल्कि जब तक ऐसे भेड़ियों को दर्दनाक मौत देकर देश के सामने ऐसा उदाहरण नहीं दिया जाएगा, तब तक इस तरह की बीमार मानसिकता पर अंकुश नहीं लगेगा।
विज्ञापन

- डॉ. प्रोमिला सुहाग, डॉयरेक्टर सेल्फ फाइनेंस विभाग।
जिन परिवार व महिलाओं के साथ ऐसी दरिंदगी हुई है, उसका दर्द वे ही महसूस कर सकते हैं। इस बुरे दौर और किस तरह की प्रताड़ना और असहनीय दर्द से गुजरें हैं, उसका अहसास दरिंदों को तनिक भर भी नहीं होता है। जब तक उन्हें इस तरह के दर्द से रूबरू नहीं कराया जाएगा, वे इस तरह का घिनौना काम करने से पहले सौ बार सोचेंगे। पहले हुए मामलों में भी आरोपियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, शायद इसी का नतीजा है कि आज लोगों में कानून का कोई भय नहीं है।
- डॉ. मोनिका मित्तल, महिला प्राध्यापक
देश की कानून व्यवस्था पर लोगों का विश्वास बनें, इसके लिए सामूहिक दुष्कर्म और निर्मम हत्या करने वालों पर तुरंत और सख्त सजा का प्रावधान होना जरूरी है। अगर कानून इसी तरह गुनाहगारों को सजा दिलाने में देरी करता रहेगा, इस तरह के अपराध एक के बाद एक देश के सामने आते रहेंगे। इससे अच्छा तो यही है कि भीड़ ही ऐसे दरिंदों को पीट पीटकर उनकी जान निकाल दे सजा दे। ये गुस्सा आज हर देशवासी के दिल में उबल रहा है।
- रिंकू पंघाल, महिला प्राध्यापक।
सरकार कानून बनाती हैं, लेकिन कानून को सख्ती से लागू नहीं कराती। अगर कानून को सख्ती से लागू किया जाए और हर नागरिक को दूसरे लोगों के अधिकारों का हनन करने से रोके तो शायद सभ्य समाज में इस तरह की बातें सुनने और देखने को ना मिले। मगर विडंबना यह है कि कानून तो बना दिए जाते हैं, मगर खुद बनाने वाले ही इसे भूल जाते हैं। इसका नतीजा बेकसूर और मासूम बेटियों को अपनी अस्मत लूटा और जान लेकर चुकाना पड़ता है।
- नंदनी महता, महिला प्राध्यापक।
लोकतंत्र में सभी को अधिकार और अपने दायित्व मिले हैं। लोकतंत्र किसी दूसरे के अधिकार और उसकी निजता का हनन करने की इजाजत नहीं देता। मगर बीमार मानसिकता के लोग न केवल लोकतंत्र के दुश्मन हैं बल्कि मानवता के नाम पर ही कलंक हैं, जिन्हें समाज में रहने का कोई हक नहीं। उनके लिए तो केवल सजा ए मौत ही होनी चाहिए।
- अमिता, महिला प्राध्यापक।
समाज में कुछ बीमार मानसिकता के लोग खुलेआम घूम रहे हैं, ऐसे लोग पूरे समाज के लिए ही खतरा है। निर्भया और अपराजिता के बाद अब महिला पशु चिकित्सक जो देश की होनहार बेटी थी, उसने अपनी अस्मत और जान गंवा दी है। मगर कब तक बेटियां इसी तरह अपने आपको इन हैवानों के हाथों खुद का बलिदान देती रहेंगी। इससे तो अच्छा है कि देश की जनता ऐसे लोगों से खुद ही हिसाब चुकता कर उन्हें मौत के घाट उतार दें।
विज्ञापन

- मनीषा अहलावत, महिला प्राध्यापक।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें