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जीवन के एक-एक दिन कम होने पर भी हम खुशी मना रहे हैं : संत कंवर महाराज

Sat, 02 Mar 2024 11:44 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
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भिवानी। दुनिया आवागमन का खेल है। हर रोज एक दिन कम करते जाते हैं और खुशी भी मनाते हैं। हैरानी की बात है कि दुनियादारी की और चीजों की बढ़ोतरी पर हमें खुशी मिलती है, परंतु जीवन के एक-एक दिन कम होने पर भी हम खुशी मना रहे हैं। संतों का जन्म और मरण एक जैसा ही है। ये जन्म संतों की संगत के लिए मिला था, फिर दुर्जन के संग से इसे क्यों जाया कर रहे हो। जन्मदिवस सांसारिक उमंग या खुशी का दिन तो है लेकिन उससे बढ़कर ये चिंतन का दिन होता है। चिंतन का इसलिए क्योंकि हमारे अनमोल जीवन का एक और वर्ष कम हो चला है।
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ये प्रवचन संत कंवर महाराज ने भिवानी रोहतक रोड पर स्थित राधास्वामी आश्रम में दिए। कंवर महाराज अपने 77वें जन्मदिवस पर संगत को सत्संग वचन दे रहे थे। संगत इस दिन को बड़े हर्षोल्लास से मनाती है। कंवर महाराज ने फरमाया कि दिन प्रतिदिन हमारी सांस घंट रही है। इसलिए अपने आगे की चिंता करो। आपको मानुष देह मिली है तो उसके लायक काम भी करो। मत भूलो आप जो आज बो रहे हो कल आप वही काटोगे। इंसान होकर इंसानियत को मत भूलो। इंसान परमात्मा की ही प्रतिकृति है। परमात्मा रूपी साहूकार आपको दी हुई पूंजी को ब्याज सहित वापस लेगा। अपने सर्वस्व को गुरु को अर्पण कर दो।
महाराज ने अपने गुरु के साथ बिताए अपने अनमोल दिनों की याद ताजा करते हुए फरमाया कि मैं भी नहीं समझता था। उन्होंने कहा कि एक बार मैं महर्षि शिवव्रतलाल महाराज की कोई पुस्तक पढ़ रहा था कि अचानक मेरे गुरु ने कहा कि ये तेरे समझ नहीं आएगी। तब मुझे बहुत गुस्सा आया कि खुद तो अनपढ़ है और मुझ पढ़े लिखे को कह रहे हैं कि समझ नहीं आएगी। लेकिन जब मैंने गुरु की संगत बढ़ाई तो मेरी समझ में आया कि मेरे गुरु कितने सही थे।
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उन्होंने कहा कि गुरु के प्रति विक्षेप आ गया तो आपने बहुत बड़ा पाप कमा लिया। चार अक्षर ज्ञान हमें समझ कम देता है, लेकिन अहंकार बहुत बड़ा दे जाता है। ज्ञान अविद्या को ही कहते हैं। ये अविद्या ही हमें संत सतगुरु से विमुख कराती है। महाराज ने कहा कि किस बात का अभिमान। बड़े-बड़े राजा सेठ साहूकार वैद ज्योतिषी ही नहीं रहे तो हमारी क्या बिसात। उन्होंने कहा कि अभी भी वक्त है ख्याल कर नहीं तो सब नाश ही होगा। अगर वक्त बुरा है तो नीची खींच लो, क्योंकि ये वक्त भी एक दिन टल जाएगा। आपकी सज्जनता की परीक्षा ही ये है कि आप कितने सहनशील हो। धरा की तरह बनो। चंदन की भांति बनो जो काटने वाली कुल्हाड़ी को भी अपनी सुगन्ध से सराबोर कर देता है।
उन्होंने कहा कि जन्मदिन की खुशी मत बनाओ। खुशी बनाओ तो गुरु की शरण में बिताए गए एक-एक दिन की बनाओ। दूसरों को नहीं अपने आप को ठगों। उन्होंने कहा कि मैं ये नहीं दावा करता कि मैं महान शिष्यों की श्रेणी में आता हूं, लेकिन मुझे इस बात का फक्र है कि मुझे अपने गुरु से प्रेम करने का उनकी सेवा करने का अवसर जीवन में मिला।
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