भिवानी। आपातकाल को लगे आज पचास वर्ष पूरे हो रहे है लेकिन उस समय की पीड़ा, कष्ट व अत्याचारों को याद कर आज भी शरीर में कंपकपी आने लगती है। 25 जून की देर रात अचानक घर आए डीएसपी ने मेरे दादा पं. रवींद्रनाथ वशिष्ठ व मेरे पिता पं. देवब्रत वशिष्ठ को थाने चलने का फरमान सुना दिया था। दादा ने उन्हें सुबह थाने आने का आश्वासन देकर जैसे-तैसे विदा किया। सुबह पांच बजे पुलिस दोबारा आ पहुंची। साधारण कपड़ों में दादा और पिताजी थाने में चले गए। मुझे नाबालिग व ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते घर की जिम्मेदारी देखने के लिए साथ नहीं लिया गया। यह कहना है भिवानी निवासी श्री भगवान वशिष्ठ का।
श्री भगवान बताते हैं कि सुबह आठ बजे जब नाश्ता देने थाने पहुंचे तब तक थाने में ठा. बीर सिंह, सागर राम गुप्ता, हीरानंद आर्य, चौ. जगन्नाथ, चौ. जंगबीर सिंह सहित पचासों नेताओं को थाने में बैठा लिया गया था। किसी को भी यह नहीं पता था कि कौन किस केस में गिरफ्तार किया गया है। । लगभग बीस दिन तक किसी भी परिवार को यह नहीं बताया कि किसे कौन सी जेल में रखा गया है। बीस दिन बाद चौ. देवीलाल को हिसार जेल से तब्दील कर पुलिस बस में महेन्द्रगढ़ ले जाया जा रहा था तब उन्होंने ही हमारे आवास चेतना सदन में बस रुकवा कर खाना लिया व बताया कि भिवानी वाले लोगों को हिसार जेल में रखा गया है। जेल में इन सभी राजनीतिक कैदियों से परिवार के सदस्य सप्ताह में एक बार उपायुक्त की स्वीकृति लेकर एक घंटे भेंट कर सकता था।
बेवजह की गई थी मेरी पिटाई
इधर पुलिस ने 26 जून को ही घर पर दस-पन्द्रह सिपाहियों की स्थायी रूप से ड्यूटी लगा दी। गिरफ्तारी के साथ ही संकटों व अत्याचाराें का दौर शुरू हो गया। मेरे परिवार का पालन-पोषण मुख्य रूप से हमारे समाचार पत्र चेतना साप्ताहिक से ही चलता था। जिसके विज्ञापन सरकार ने पहले ही बंद कर रखे थे। अखबार पर बंदिशें लगा दी गई। हर सप्ताह जिला लोक संपर्क अधिकारी हर पृष्ठ को चैक करके ही उसे छपने की स्वीकृति देते थे। समाचार पत्र में हर सप्ताह बीस व पांच सूत्री कार्यक्रम प्रकाशित करने व केवल सरकारी खबर देने के ही निर्देश दिए जाते थे। परिवार के दोनों कमाने वाले जेल में जाने से सब हालात डगमगा गए। इधर बीर सिंह फरवरी 1976 को सुबह पुलिस ने आकर बताया कि मेरे वारंट रद्द हो गए है। इसलिए पुलिस को हटाया जा रहा है। वह सब एक नाटकीय चाल थी। उसके चलते मैं घर से बाहर आ गया और अपने परिवार की जरूरतों का कुछ समान लेकर सायं 6 बजे के आसपास स्कूटर से घर पहुंचा तो वहां खड़े लोगों ने मुझे सरियों व लाठियों से बेतहाशा मारकर बेहोश कर दिया। उस समय मुझे पास ही रहने वाले बृहनललाओं (हिजड़ों) ने मेरे ऊपर कूदकर मेरी जान बचाई। भिवानी के डॉक्टरों द्वारा पुलिस केस बताकर इलाज से मना कर दिया गया। आठ दिन रोहतक मेडिकल कॉलेज में चले ईलाज के बाद हमलावारों को मेडिकल में अपने ही वार्ड में देखकर मजबूरन वहां से छुट्टी लेकर हम माँ-बेटे भिवानी आए। मुंह अंधेरे भिवानी अपने घर पहुंचते ही बाहर भारी महिला-पुरुष पुलिस को देख पकड़ा गया। पूछताछ में पता चला कि मेरी माता संतोष वशिष्ठ पर अखबार का प्रकाशन करने को लेकर केस दर्ज किए गए हैं।
अनुमति पत्र होने के बावजूद दादा से मिलने नहीं दिया
मेरे दादा व पिता को अलग-अलग जेलों में रखा गया, ताकि आर्थिक रूप से कमर टूट जाए। जब अपनी मां के साथ अंबाला जेल में मिलने गया, तो हम मां बेटा के पास दादा व पिता से मिलने का डीसी द्वारा जारी अनुमति पत्र था, लेकिन मुझे मेरे दादा से यह कर कर मिलने नहीं दिया, कि आप दोनों का खून का रिश्ता नहीं है। इसलिए आप बातचीत नहीं कर सकते। वहां बैठे अन्य बड़े दिग्गज राजनेताओं की गुहार का भी कोई असर जेल अधिकारियों पर नहीं था। जबकि मेरे माता अपने ससुर से एक घंटे सीआईडी कर्मचारी की उपस्थिति में बात कर चुकी थी। आंतरिक सुरक्षा जैसे सख्त कानून के तहत जेल में बंदी बनाने के पीछे अहम कारण यह भी रहा कि केन्द्रीय स्तर के राज नेताओं मोरार जी देसााई, चौ. चरण सिंह, चौ. देवीलाल, चौ. चांदराम, पं. भगवत दयाल शर्मा, पं. श्रीराम शर्मा, डॉ. मंगल सैन सहित प्रदेश के विपक्षी नेताओं की चेतना सदन में नियमित बैठकें, सलाह मशविरा व राजनीतिक मंथन के लिए आना-जाना था।
पं. देवब्रत वशिष्ठ।
पं. देवब्रत वशिष्ठ।