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पड़ोसी जिले जला रहे पराली, लोगों के लिए आफत बन रहा पर्यावरण प्रदूषण

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फोटो 201 धान की कटाई करते हुए मजदूर - फोटो : Bhiwani
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जिले के किसान अब धान की पराली जलाते नहीं बल्कि बेचकर या पशुचारा बना मुनाफा कमा रहे हैं। अनेक किसानों ने तो इसे व्यापार ही बना लिया है और पराली से पशुचारा बेच प्रति एकड़ पांच से आठ हजार रुपये कमा रहे हैं। अनेक किसान खेत की मिट्टी में ही पराली मिला जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बढ़ा रहे हैं। कृषि विभाग भी किसानों को इस दिशा में प्रोत्साहित करने के लिए उपकरणों पर अनुदान दे रहे हैं। मगर अब समस्या है पड़ोसी जिलों में जलती पराली। इस कारण हर वर्ष ही पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है और लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है। हिसार, रोहतक, जींद, फतेहाबाद में पराली खूब जलाई जाती है। जिसका असर भिवानी की हवा पर भी पड़ता है और इसका खामियाजा यहां के लोगों को भुगतना पड़ता है।
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यूं पराली बनी मुनाफे का सौदा : भिवानी के किसान जहां मशीन से धान की कटाई करते हैं वहां पराली को काट खेत की मिट्टी में मिला दिया जाता है। जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। इसके अलावा जहां किसान हाथ से कटाई करवाते हैं वहां पराली को बेच देते हैं। कुछ लोगों ने तो इसे व्यापार बना लिया है। एक एकड़ जमीन की पराली दो से ढाई हजार रुपये तक बिक जाती है। कुछ व्यापारी इसे खरीद थ्रेसिंग मशीन से उसका तूड़ा बनवा लेते हैं। एक एकड़ जमीन की पराली से करीब 25 क्विंटल तक तूड़ा बन जाता है। इस पर करीब साढ़े तीन हजार रुपये तक लागत आती है मगर मंडियों में यह आठ से 10 हजार रुपये में बिक जाता है। ऐसे में यह मुनाफे का सौदा साबित हो रहा है।
पराली जलाने पर महज एक किसान पर लगाया जुर्माना : पराली जलाने पर जिले में अब तक एक किसान पर कृषि विभाग ने जुर्माना लगाया है। करीब साढ़े सात हजार रुपये जुर्माना किया गया था। पराली जलाने पर एक पुलिस केस भी पिछले वर्ष किया गया था मगर यह कृषि विभाग ने नहीं बल्कि एक किसान ने ही दूसरे किसान पर दर्ज करवाया था। इस केस में एक किसान ने दूसरे किसान पर उसकी पराली जलाने के आरोप लगाये थे।
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200 किसानों को अनुदान पर मिले उपकरण, आवेदन आए 2800 : कृषि विभाग की ओर से कृषि उपकरण रोटावेटर, जीरो टिलेज मशीन, हैप्पी सीडर, स्ट्रा चौपर, मलसर, स्ट्रा स्लैसर, स्ट्रा सरैडर, स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम, हाइड्रोलिक रिवर्सिबल एंबीप्लाऊ अनुदान पर दिए गए। करीब 2800 किसानों ने आवेदन किया। इनमें से अब तक दो सौ किसानों को अनुदान पर ये उपकरण दिए गए हैं। विभाग की ओर से इन उपकरणों के लिए आवेदन करने वाले एक किसान को 50 प्रतिशत, 10 किसानों के समूह को 80 फीसदी तक अनुदान दिया गया। ये सभी उपकरण पराली को काट जमीन में मिलाते हैं।
प्रदूषण बनता आफत, स्वास्थ्य खराब, उद्योग-धंधे बंद : हर वर्ष पड़ोसी जिलों में पराली जलाने से प्रदूषण बढ़ता है। पर्यावरण प्रदूषित होने से लोगों में एलर्जी, गला खराब, खांसी-जुकाम के केस अचानक से कई गुणा बढ़ जाते हैं। पर्यावरण प्रदूषण के चलते जिला प्रशासन को ईंट-भट्ठे, फैक्टरियां बंद करानी पड़ती है। ऐसे में स्वास्थ्य भी खराब और उद्योग-धंधे भी चौपट।
जागरूकता कार्यक्रम कर किसानों को पराली जलाने से होने वाले नुकसान बताये जा रहे हैं। किसानों को पराली को काट जमीन में ही मिलाने के लिए उपकरण अनुदान पर दिए जा रहे हैं।
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प्रताप सभ्रवाल, उप निदेशक, कृषि विभाग
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